शिक्षा

रिश्तों की दरारों में छिपी धूप:डॉ. विनय कुमार वर्मा

चंदौली,यूपी: बचपन में दो भाई एक ही थाली में खाते हैं, एक ही खाट पर सोते हैं, एक-दूसरे के लिए लड़ते हैं, एक-दूसरे के लिए रोते हैं। उनके बीच “मेरा–तेरा” का कोई गणित नहीं होता। उनका संसार साझा होता है- कपड़े भी, खिलौने भी, सपने भी। पर समय की नदी जब युवावस्था से विवाह की दहलीज़ पर पहुँचती है, तो वही साझा संसार धीरे-धीरे सीमाओं में बँटने लगता है। घर में एक नई स्त्री का आगमन होता है- पत्नी के रूप में और अनजाने में रिश्तों की लय बदल जाती है।

अक्सर समाज जल्दी से निष्कर्ष निकाल लेता है- “बहू आई और घर टूट गया।” पर क्या सच इतना सरल है? क्या दो भाइयों के बीच वर्षों से बना विश्वास इतना हल्का था कि किसी तीसरे के आने से वह बिखर गया? या दरारें पहले से थीं, केवल दिखाई नहीं देती थीं?

सच यह है कि किसी भी घर के विखंडन का कारण केवल एक व्यक्ति नहीं होता। विवाह केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं; वह दो संस्कारों, दो अनुभवों और दो परिवारों की मानसिकताओं का मिलन है। नई बहू जब घर में आती है, तो वह भी अपने साथ अपने मायके की स्मृतियाँ, अपने डर, अपनी अपेक्षाएँ और अपनी असुरक्षाएँ लेकर आती है।     मनोवैज्ञानिक स्तर पर देखें तो विवाह के बाद पुरुष की प्राथमिकताएँ बदलती हैं। उसका भावनात्मक केंद्र धीरे-धीरे पत्नी और बच्चों की ओर खिसकता है। यह स्वाभाविक है। पर समस्या तब जन्म लेती है जब यह परिवर्तन संतुलन खो देता है। भाई जो पहले एक-दूसरे के जीवन में बराबर हिस्सेदार थे, अब अलग-अलग संसारों के केंद्र बन जाते हैं।

यहाँ परीक्षा केवल स्त्री की नहीं, भाइयों की भी होती है। यदि किसी के कहने मात्र से वे जन्म-जुड़े रिश्ते पर प्रश्नचिह्न लगा देते हैं, तो इसका अर्थ है कि भीतर कहीं विश्वास की जड़ें गहरी नहीं थीं।

बहू का प्रभाव निश्चित रूप से पड़ता है। वह पति के जीवन में निकटतम व्यक्ति होती है। उसके शब्द, उसके संकेत, उसकी शिकायतें महत्व रखती हैं। पर यह भी उतना ही सत्य है कि अंतिम निर्णय पति ही लेता है। यदि वह संतुलित है, तो वह सुनकर भी विवेक से निर्णय करेगा। यदि वह असुरक्षित है, तो वह सुनी-सुनाई बातों में बह सकता है।  सामाजिक कारण भी कम महत्वपूर्ण नहीं। संयुक्त परिवारों में संपत्ति, अधिकार और निर्णय की साझेदारी होती है। विवाह के बाद नई बहू अपनी जगह चाहती है- सम्मान, सुरक्षा और स्वतंत्रता। यदि उसे लगे कि उसका अस्तित्व दब रहा है, तो वह स्वाभाविक रूप से अपने पति को अपनी ओर खींचना चाहेगी। यह खींचाव कभी-कभी अलगाव में बदल जाता है।

पर आश्चर्य का पक्ष यह है कि वही स्त्री अपने मायके में बँटवारा नहीं चाहती। वह अपने भाइयों के बीच दरार नहीं देखना चाहती। वह नहीं चाहती कि उसके माता-पिता से उसके भाई दूर हों। …तो फिर ससुराल में यह संवेदनशीलता क्यों कम हो जाती है?इसका उत्तर मनोविज्ञान में छिपा है। मायका उसके लिए सुरक्षित स्मृति है-यहाँ गलती केवल उसकी नहीं। यदि घर का वातावरण स्वागतपूर्ण और स्पष्ट सीमाओं वाला हो, तो असुरक्षा कम होती है। यदि तुलना, पक्षपात या उपेक्षा हो, तो दरारें गहरी होती हैं।

समाधान दोषारोपण में नहीं, संतुलन में है। @  पहला उपाय है- विवाह से पहले मूल्य और दृष्टिकोण की स्पष्टता। केवल बाहरी गुण नहीं, मानसिक परिपक्वता को भी देखना आवश्यक है। जो व्यक्ति संवादप्रिय हो, जो परिवार की संरचना को समझने को तैयार हो, वही संयुक्त जीवन में संतुलन ला सकता है। @ दूसरा उपाय- विवाह के बाद स्पष्ट संवाद। भाइयों को यह समझना होगा कि पत्नी का सम्मान और भाई का स्नेह विरोधी नहीं हैं। दोनों को संतुलित रखना परिपक्वता है। @तीसरा- घर के बड़े सदस्यों का निष्पक्ष रहना। यदि वे पक्षपात करेंगे, तो दरारें बढ़ेंगी। @चौथा- आँख बंद करके किसी की भी बात पर विश्वास न करना। न पत्नी की हर शिकायत अंतिम सत्य है, न माता -पिता, भाई व बहन की हर प्रतिक्रिया। विवेक ही पुल है।

विश्वास अंधा नहीं, जागरूक होना चाहिए। यदि पत्नी किसी समस्या की ओर संकेत करती है, तो उसे सुना जाए। पर निर्णय तथ्यों और संवाद से लिया जाए, भावुक आवेग से नहीं।   भाइयों को यह याद रखना होगा कि विवाह नया संबंध जोड़ता है, पुराना तोड़ता नहीं। यदि नया संबंध पुराने को विस्थापित कर दे, तो कहीं न कहीं संतुलन खो गया है। स्त्री के लिए भी आवश्यक है कि वह समझे- पति का भाई उसका प्रतिस्पर्धी नहीं, परिवार का हिस्सा है। यदि वह घर को केवल “मेरा-तेरा” के चश्मे से देखेगी, तो उसका संसार स्वयं छोटा हो जाएगा।

…और भाइयों के लिए यह सीख आवश्यक है कि वे अपने निर्णयों की जिम्मेदारी लें। किसी तीसरे को दोष देकर वे अपने कर्तव्य से मुक्त नहीं हो सकते। संयुक्त परिवार तभी टिकता है जब उसमें पारदर्शिता हो। संपत्ति, अधिकार और जिम्मेदारियाँ स्पष्ट हों। अस्पष्टता संदेह को जन्म देती है और संदेह नफरत में बदल सकता है।रिश्तों को बचाने के लिए अहं को छोटा करना पड़ता है। यह कार्य केवल स्त्री या पुरुष का नहीं; दोनों का है।परिवार कोई युद्धक्षेत्र नहीं; वह साझेदारी है।यदि कभी दूरी बढ़ भी जाए, तो संवाद का दरवाज़ा बंद नहीं होना चाहिए। रिश्ते टूटते नहीं, उपेक्षा से सूखते हैं।

विवाह में सावधानी यह नहीं कि “ऐसी स्त्री घर में न आए”; सावधानी यह है कि परिपक्वता, संवाद और संतुलन को महत्व दिया जाए। क्योंकि कोई भी व्यक्ति पूर्ण नहीं। परिस्थिति और व्यवहार मिलकर ही घर बनाते या बिगाड़ते हैं। घर को विखंडित होने से बचाने का एक ही स्थायी उपाय है- साझा दृष्टि। यदि सब यह मान लें कि संबंध संपत्ति से बड़े हैं, और अहं से छोटे-तो परिवार की जड़ें गहरी रहेंगी।

बचपन की वह थाली जिसमें दो भाई साथ खाते थे, केवल स्मृति नहीं; वह संकेत है कि साझेदारी संभव है। विवाह के बाद भी वह साझेदारी नए रूप में जीवित रह सकती है- यदि धैर्य, संवाद और विवेक साथ हों। रिश्तों की दरारों में भी धूप उतर सकती है, बशर्ते हम दीवारें ऊँची करने के बजाय खिड़कियाँ खोलने का साहस रखें। यही साहस परिवार को टूटने से बचाता है, और यही परिपक्वता उसे समय की आँधी में भी अडिग रखती है।

{डॉ. विनय कुमार वर्मा:लेखक,कवि, मोटिवेशनल स्पीकर,सीएमडी; सीपीएस स्कूल ऑफ ग्रुप}

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