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लौहपुरुष सरदार बल्लभ भाई पटेल भारत की आत्मा का शिल्पकार:डॉ. विनय कुमार वर्मा

चंदौली,यूपी:  कहते हैं न हर युग में एक व्यक्ति ऐसा जन्म लेता है जो अपने समय से बड़ा होता है,जो समय को नहीं बल्कि समय जिसे परिभाषित करता है। भारत के लिए वह व्यक्ति सरदार वल्लभभाई पटेल थे। वह कोई राजा नहीं थे, न सेनापति, न कवि और न साधु – पर उनके भीतर इन सबकी एक उज्ज्वल छाया थी। वह जितने कठोर थे, उतने ही करुणामय; जितने प्रशासनिक, उतने ही भावनात्मक। उनके व्यक्तित्व की ध्वनि उस निहित भारतीय आत्मा की थी जो एकता में सौंदर्य और विविधता में शक्ति खोजती है।

1875 में नडियाद (गुजरात) की धूल भरी धरती पर जब वल्लभभाई का जन्म हुआ, तब किसी ने नहीं सोचा था कि यह बालक आगे चलकर ‘भारत का लौहपुरुष’ कहलाएगा। पिता झवेरभाई एक साधारण किसान, पर हृदय में बगावत का लहू; माँ लाडबाई में धर्म और त्याग का सौंदर्य। यही दो धाराएँ उनके भीतर मिलीं – एक कर्म की, दूसरी करुणा की। बचपन में गाँव का माटीभरा वातावरण, साधारण विद्यालय, और कंधे पर झोला… लेकिन मन में तेज़ी, दृढ़ता और अनुशासन का अद्भुत समन्वय।

उन्होंने कहा था -“सच्चा मनुष्य वही है जो कठिनाई से न डरे और जो सत्य पर अडिग रहे।” यही वाक्य आगे चलकर उनके जीवन का घोष बना।

युवा वल्लभभाई ने कानून की पढ़ाई के लिए लंदन का रुख किया। अपने खर्च से, बिना किसी सुविधा के। वहाँ उन्होंने समय पर खाना, नींद और विश्राम तक छोड़कर अपने जीवन को अनुशासन का मंदिर बना दिया। वही व्यक्ति जो बाद में देश के सबसे बड़े राज्यों को जोड़ेगा, पहले अपने भीतर की अराजकता को संयम से जोड़े बैठा था। वापस आकर अहमदाबाद में वकालत शुरू की – सफलता ऐसी कि लोग कहते, “पटेल की दलील अदालत में नहीं, मन में उतर जाती है।” पर इस सफल वकील के भीतर धीरे-धीरे एक साधक जाग उठा – जो केवल अपने परिवार नहीं, अपने देश का मुकदमा लड़ना चाहता था।

1917 में गांधीजी से मुलाकात हुई। यह दो ध्रुवों का मिलन था – एक करुणा का सागर, दूसरा दृढ़ता का पर्वत। गांधी ने देखा, यह व्यक्ति केवल सुनता नहीं, करता है। और पटेल ने देखा, यह महात्मा केवल बोलता नहीं बल्कि जीता है।जब खेड़ा और बारडोली के किसान कराह रहे थे, सरकार कर नहीं छोड़ रही थी, तब गांधी ने कहा – “कौन आगे बढ़ेगा?” पटेल उठे – “मैं जाऊँगा।”     बारडोली सत्याग्रह भारत के इतिहास की अमिट गाथा बन गया। बिना हिंसा, बिना हथियार, उन्होंने अंग्रेज़ों की नीतियों को झुका दिया। तब महात्मा ने कहा – “वल्लभभाई अब सरदार बन गए।”

यह उपाधि जननेता ने नहीं, जनता ने दी थी। पटेल के नेतृत्व में कांग्रेस का संगठन केवल एक राजनीतिक ढाँचा नहीं रहा, वह भारत की आत्मा का अभ्यासशाला बन गया। चुनाव, सत्याग्रह, जेल- सब उनके जीवन के साधन बन गए। वह गांधी के सिद्धांतों के सबसे व्यावहारिक सिपाही थे – मानते थे कि “धर्म और राजनीति दोनों को मिलकर समाज को दिशा देनी चाहिए।”उनकी भाषा ठोस थी, पर हर वाक्य में करुणा थी। उन्होंने कहा – “अगर कोई काम कठिन लगे तो समझो कि वही काम तुम्हें करना चाहिए।”देश का हर कोना उनकी नज़र में था, हर दुख उनकी चिंता में। पर वे भावुक नहीं हुए – उन्होंने नीति, प्रशासन और अनुशासन से भावनाओं को दिशा दी।

1947 में जब भारत स्वतंत्र हुआ, वह दृश्य जितना आनंदमय था, उतना ही विस्फोटक भी। 562 देशी रियासतें, प्रत्येक अपनी सेना, झंडा, मुद्रा और स्वार्थ के साथ। भारत के मानचित्र पर जैसे सैकड़ों बिखरे टुकड़े पड़े हों। उस समय प्रधानमंत्री नेहरू का करिश्मा और गांधी का नैतिक बल था, पर जो व्यक्ति इन टुकड़ों को जोड़ने का साहस कर सकता था, वह केवल एक था – सरदार वल्लभभाई पटेल।कूटनीति, दृढ़ता और बुद्धिमत्ता का ऐसा अद्भुत मिश्रण भारतीय इतिहास में फिर नहीं देखा गया।

हैदराबाद के निज़ाम से लेकर जूनागढ़ के नवाब तक, उन्होंने संवाद और साहस दोनों का उपयोग किया। कश्मीर के प्रश्न पर उन्होंने स्पष्ट कहा था – “देश की एकता किसी की कृपा पर नहीं, हमारे निर्णय पर टिकी है।”    राज्यों के एकीकरण का यह कार्य कोई प्रशासनिक उपलब्धि नहीं थी, यह भारत की आत्मा का पुनर्जन्म था।उनके कार्यालय में भारत का नक्शा हमेशा सामने रहता, और हर राज्य के जुड़ते ही उनकी आँखों में वही चमक आती – जैसे माँ अपने बिछड़े पुत्र को वापस पाती है।

लोग उन्हें ‘आयरन मैन ’ कहते हैं, पर उनके भीतर एक कोमलतम मन था। अपनी पत्नी झवेरबा के निधन के बाद भी उन्होंने परिवार के हर उत्तरदायित्व को निभाया।उनका अनुशासन कठोर था, पर वह कठोरता बाहर की दुनिया के लिए थी – भीतर वह माँ जैसी संवेदना से भरे थे।एक बार जब कोई नौजवान अधिकारी गलती कर बैठा और रोने लगा, सरदार ने कहा- “रोने से बेहतर है अपनी गलती से सीखो, ताकि अगली बार मैं तुम्हें सम्मान दे सकूँ।”

जब 30 जनवरी 1948 को गांधीजी की हत्या हुई, तब पूरे राष्ट्र की तरह सरदार भी टूट गए।उन्होंने कहा – “मैंने अपने पिता को खो दिया। अब देश अनाथ हो गया।”उस दिन उन्होंने नेहरू को पत्र लिखा – “अब हमें व्यक्तिगत मतभेदों को समाप्त कर देना चाहिए, क्योंकि गांधी के बिना देश नहीं, हम भी अधूरे हैं।”यह उनके विशाल हृदय की झलक थी – राजनीति में भले मतभेद रहे हों, पर राष्ट्रभाव में कोई भेद नहीं।  यह सच है कि नेहरू और पटेल के बीच दृष्टिकोण का अंतर था – एक आदर्शवादी अंतरराष्ट्रीय दृष्टि वाला नेता, दूसरा धरती से जुड़ा व्यवहारवादी कर्मयोगी।

नेहरू कहते – “भारत समाजवाद की ओर बढ़े। ”पटेल कहते – “पहले भारत एक रहे, तभी समाजवाद भी रहेगा।”पर दोनों की नीयत एक थी -भारत को महान बनाना।उनका मतभेद वैर नहीं, विवेक का अंतर था। शायद इसी कारण गांधीजी ने कहा था – “अगर मैं नहीं रहूँ, तो वल्लभभाई ही कांग्रेस का नेतृत्व करें।”

1950 का दिसंबर माह था। शरीर थक चुका था परन्तु मन अब भी सजग था। उनके अंतिम दिनों में भी वही अनुशासन था।दिल का दौरा पड़ा – डॉक्टरों ने कहा, “आराम कीजिए।”उन्होंने मुस्कराकर कहा – “मेरे जीवन में आराम का क्या काम?    15 दिसंबर 1950 को यह लौहपुरुष देह छोड़ गया। पर उनके जाने के बाद भी भारत की सीमाएँ उनकी साँसों से बँधी रहीं।     उनके जीवन के बहुत सारे अनकहे प्रसंग हैं – एक बार किसी ने पूछा “सरदार, आप इतना कठोर क्यों हैं?”उन्होंने हँसकर कहा – “क्योंकि मैं जिस देश से प्रेम करता हूँ, उसकी मिट्टी को ढालना है और मिट्टी को आकार देने के लिए आग में जलना पड़ता है।  गांधीजी की गिरफ्तारी के बाद कांग्रेस के नेता असमंजस में थे। पटेल ने कहा – “नेता जेल में हो सकते हैं, पर देश नहीं रुक सकता।” उसी क्षण उन्होंने आंदोलन को दिशा दी।

प्रधानमंत्री बनने की संभावना के प्रश्न पर उन्होंने कहा – “मुझे पद नहीं, देश चाहिए।” यह वाक्य बताता है कि उनके लिए सत्ता नहीं, सेवा ही परम धर्म था।        पटेल ने भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) और भारतीय पुलिस सेवा (IPS) को “देश की रीढ़” कहा।उन्होंने स्वतंत्र भारत के नौकरशाहों से कहा था – “तुम अब अंग्रेज़ों के नहीं, भारतीय जनता के सेवक हो। अगर तुम जनता के लिए काम नहीं करोगे, तो यह देश तुम्हें माफ नहीं करेगा।”आज भी भारत के प्रशासनिक ढाँचे में उनका वही दृष्टिकोण जिंदा है – कर्तव्य पहले, सुविधा बाद में; देश पहले, व्यक्ति बाद में।

70 वर्षों बाद जब नर्मदा के तट पर ‘स्टेचू ऑफ़ यूनिटी ’ खड़ी हुई, तब वह केवल एक मूर्ति नहीं थी – वह सरदार की आत्मा का पुनरागमन था।182 मीटर ऊँची, पर उससे ऊँचा उस व्यक्ति का आदर्श – जिसने बिना युद्ध, बिना रक्तपात, बिना गर्व के, भारत को जोड़ दिया। वह प्रतिमा पत्थर की नहीं, स्मृति की है – एक ऐसे व्यक्ति की जिसने कहा था – “यह देश मेरी माँ है, और उसकी एकता मेरी पूजा।”       आज जब भारत चुनौतियों से घिरा है – सीमाओं पर, समाज में, विचारों में… तब पटेल की वाणी फिर गूँजती है: “कमज़ोर राष्ट्र कभी स्वतंत्र नहीं रह सकता।”उनका जीवन सिखाता है कि देश की ताकत शब्दों में नहीं, चरित्र में होती है।वे हमें यह भी सिखाते हैं कि एकता कोई नारा नहीं, साधना है।

सरदार वल्लभभाई पटेल कोई व्यक्ति नहीं, भारत की चेतना का दृश्यमान रूप थे।उनके भीतर किसान की सादगी, सेनापति का साहस, प्रशासक की बुद्धि और ऋषि की शांति थी।उन्होंने भारत को न केवल जोड़ा, बल्कि आत्मनिर्भर बनाया। आज जब हम ‘भारत’ कहते हैं – तो उसमें वल्लभभाई का पसीना, धैर्य, और संकल्प घुला हुआ है।वह व्यक्ति चला गया, पर उसका वाक्य आज भी जीवित है – “देश को एकजुट रखिए। यह हमारी सबसे बड़ी पूँजी है। भारत के मानचित्र पर हर राज्य का नाम जब हम उच्चारते हैं, तो उसके पीछे सरदार की छाया झलकती है और इतिहास मानो फुसफुसाकर कहता है-“यह भारत है… पटेल का भारत।”

(डॉ. विनय कुमार वर्मा)

लेखक,कवि, वरिष्ठ पत्रकार, सीएमडी: सीपीएस स्कूल)

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