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माँ – स्मृति, ममता और मौन का सबसे सुंदर नाम:डॉ. विनय कुमार वर्मा

चंदौली,यूपी: दुनिया में कुछ शब्द ऐसे होते हैं जिन्हें बोलते ही मन अपने आप घुटनों के बल बैठ जाता है। “माँ” उन्हीं शब्दों में से एक है। यह केवल एक संबोधन नहीं, बल्कि मनुष्य की पहली प्रार्थना है। शायद इसीलिए जब कोई बच्चा जन्म लेता है तो उसके होंठों पर सबसे पहले कोई भाषा नहीं आती, कोई व्याकरण नहीं आता, कोई संस्कार नहीं आता – केवल एक ध्वनि आती है… “माँ…”। यह ध्वनि संसार की सबसे छोटी, पर सबसे गहरी कविता है।

माँ को समझना उतना ही कठिन है जितना किसी नदी से पूछना कि वह बहती क्यों है। माँ कारणों से नहीं चलती, वह प्रेम से चलती है। वह अपने हिस्से की नींद काटकर बच्चों के सपनों में उजाला सिलती है। वह अपने दर्द को ऐसे छुपा लेती है जैसे पेड़ अपनी सूखी जड़ों को मिट्टी के भीतर छुपा लेते हैं ताकि पत्तियाँ हरी दिखाई दें। माँ घर में रहती नहीं, घर को जीवित रखती है।

कितना विचित्र है न… हम जीवन में बहुत कुछ भूल जाते हैं। स्कूल का पहला पाठ, कॉलेज का पहला मित्र, कई रिश्तों के चेहरे, कई शहरों के रास्ते… पर माँ की उँगली पकड़कर चलना कभी नहीं भूलते। माँ की गोद शायद दुनिया का वह एकमात्र स्थान है जहाँ आदमी उम्र भर बच्चा बना रहना चाहता है। चाहे वह पचास वर्ष का हो जाए, चाहे उसके बाल सफेद हो जाएँ, चाहे वह बड़े पद पर पहुँच जाए – माँ के सामने बैठते ही उसकी आवाज़ में वही बचपन लौट आता है।

माँ सचमुच ईश्वर की सबसे सुंदर असफलता है। शायद ईश्वर हर जगह स्वयं उपस्थित नहीं रह सकता था, इसलिए उसने माँ को बनाया और फिर निश्चिंत होकर बैठ गया कि अब पृथ्वी पर प्रेम जीवित रहेगा।

याद कीजिए… बचपन में जब बुखार आता था तो दवा से पहले माँ का हाथ माथे पर रखा जाता था। वह हाथ थर्मामीटर से अधिक सटीक होता था। माँ बिना रिपोर्ट देखे बीमारी पहचान लेती थी। उसे पता चल जाता था कि बच्चा भूखा है, उदास है, डरा हुआ है या केवल किसी बात पर चुप है। माँ बच्चों के चेहरे नहीं पढ़ती, उनकी आत्मा पढ़ती है।

एक माँ कितनी बार मरती है, इसका हिसाब किसी धर्मग्रंथ में नहीं लिखा गया। जब बच्चा पहली बार स्कूल जाता है, तब वह थोड़ा रोती है। जब बेटा पहली बार घर से दूर नौकरी करने जाता है, तब वह थोड़ा और टूटती है। जब बेटी विदा होती है, तब उसकी आँखों के भीतर एक पूरा समुद्र डूब जाता है। …और जब बच्चे बड़े होकर व्यस्त हो जाते हैं, फोन कम करने लगते हैं, बातों में चिड़चिड़ापन आने लगता है – तब माँ चुपचाप अपने भीतर मरने लगती है। पर आश्चर्य देखिए… वह तब भी बच्चों को आशीर्वाद देना नहीं छोड़ती।

माँ शायद दुनिया का इकलौता रिश्ता है जहाँ अधिकार से अधिक त्याग होता है। वह अपने हिस्से का अच्छा खाना बच्चों की प्लेट में रख देती है। खुद पुराने कपड़े पहन लेती है लेकिन बच्चों के लिए त्योहार खरीद लेती है। कई बार तो वह अपने जीवन की सारी इच्छाएँ बच्चों की सफलता के पीछे ऐसे गाड़ देती है जैसे किसान बीज को मिट्टी में गाड़ देता है, यह जानते हुए कि फल शायद उसके हिस्से में नहीं आएगा।

और सच कहूँ तो, माँ बूढ़ी नहीं होती… केवल धीरे-धीरे थकने लगती है। उसके हाथ काँपने लगते हैं, आँखों पर मोटा चश्मा चढ़ जाता है, घुटनों में दर्द रहने लगता है, लेकिन बच्चों के लिए उसकी चिंता कभी बूढ़ी नहीं होती। वह अस्सी साल की उम्र में भी पूछती है – “खाना खाया?”, “ठीक से पहुँचे?”, “बहुत देर तक जागा मत करो…”। यह प्रश्न नहीं होते, यह उसकी साँसें होती हैं।

लेकिन इस संसार में सबसे बड़ा दुःख शायद यह नहीं कि किसी की माँ मर गई… सबसे बड़ा दुःख यह है कि माँ के रहते हुए भी कई लोग उनसे दूर हो गए। आज के समय में वृद्धाश्रम केवल इमारतें नहीं हैं, वे आधुनिकता के माथे पर लगे हुए प्रश्नचिह्न हैं। जिन हाथों ने बच्चों को चलना सिखाया, उन्हीं हाथों को बुढ़ापे में सहारे की जरूरत पड़ जाए और बच्चे व्यस्तता का बहाना बनाने लगें – इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा?

कभी-कभी लगता है कि हम सफलता की दौड़ में इतने आगे निकल आए हैं कि पीछे मुड़कर देखने की फुर्सत ही नहीं बची। हम माँ के लिए महँगे उपहार खरीद लेते हैं, पर उनके पास बैठने का समय नहीं निकाल पाते। हम सोशल मीडिया पर “हैप्पी मदर्स डे” लिख देते हैं, पर महीनों माँ की आँखों में झाँककर यह नहीं पूछते कि “आप सच में कैसी हैं?”।

…और जिनकी माँ अब इस दुनिया में नहीं हैं… उनके लिए “माँ” केवल शब्द नहीं, एक अधूरा आकाश है। वे लोग मदर्स डे पर सबसे ज्यादा मुस्कुराने की कोशिश करते हैं ताकि कोई उनकी आँखों की नमी न पढ़ ले। पर भीतर कहीं एक खाली कमरा हमेशा गूंजता रहता है। माँ के जाने के बाद आदमी चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो जाए, भीतर से अनाथ हो जाता है।

माँ के बिना घर वैसा ही लगता है जैसे मंदिर बिना दीपक के। सब कुछ अपनी जगह पर होता है – दीवारें, दरवाज़े, बर्तन, तस्वीरें पर फिर भी कुछ नहीं होता। रसोई में वही मसाले रहते हैं, पर स्वाद कहीं खो जाता है। सुबह वही सूरज निकलता है, पर घर में उजाला कम लगता है। और सबसे ज्यादा तो त्योहार रुलाते हैं। क्योंकि त्योहार वस्त्रों और मिठाइयों से नहीं बनते, माँ की आवाज़ से बनते हैं।

जिस व्यक्ति ने अपनी माँ खो दी है, उससे पूछिए कि “माँ” क्या होती है। वह बताएगा कि अब कोई बिना कारण फोन नहीं करता। अब कोई यह नहीं पूछता कि “इतनी देर क्यों हो गई?”। अब बीमारी में दवा तो मिल जाती है, पर माथे पर वह हथेली नहीं मिलती जो आधा दर्द छूते ही पी जाती थी। माँ के जाने के बाद आदमी समझता है कि घर में एक व्यक्ति नहीं था – पूरा घर ही वही थी।

कई लोग अपनी माँ से कभी खुलकर प्रेम भी नहीं जता पाते। भारतीय घरों में अक्सर प्रेम चुप्पियों में पलता है। बेटा बड़ा हो जाता है, माँ से गले लगना कम हो जाता है। बातें औपचारिक होने लगती हैं। पर रात को वही बेटा बाहर से लौटकर सबसे पहले माँ के कमरे की लाइट देखता है। उसे पता होता है कि जब तक वह जाग रही है, दुनिया पूरी तरह निर्दयी नहीं हुई है।

माँ के आँसू बहुत रहस्यमयी होते हैं। वह अपने लिए कम रोती है, बच्चों के लिए ज्यादा रोती है। बच्चे भूखे हों तो रोती है, बीमार हों तो रोती है, सफल हो जाएँ तो भी रोती है। शायद माँ की आँखें संसार का सबसे पवित्र तीर्थ हैं। उनमें स्वार्थ नहीं होता।

और देखिए, कितना अजीब न्याय है जीवन का – जब हम छोटे होते हैं तब माँ हमारी उँगली पकड़कर चलना सिखाती है। और जब वह बूढ़ी होती है, तब उसे हमारी उँगली की जरूरत पड़ती है। लेकिन कई लोग उसी समय सबसे ज्यादा व्यस्त हो जाते हैं। यह केवल संवेदनहीनता नहीं, यह मनुष्य होने की हार है।   मुझे हमेशा लगता है कि किसी भी सभ्यता की असली पहचान उसके मंदिरों, इमारतों या तकनीक से नहीं होती। वह इस बात से होती है कि वहाँ माताओं का सम्मान कितना बचा हुआ है। जिस समाज में माँ की आँखें नम हैं, वह समाज भीतर से दरिद्र है चाहे बाहर से कितना भी अमीर क्यों न दिखे।

माँ को केवल “त्याग की मूर्ति” कह देना भी अन्याय है। वह केवल त्याग नहीं, शक्ति भी है। वही घर की पहली शिक्षक है, पहली दार्शनिक है, पहली चिकित्सक है, पहली रसोइया है, पहली मित्र है और कई बार पहली कवयित्री भी। बच्चे का व्यक्तित्व सबसे पहले माँ की गोद में लिखा जाता है। संसार बाद में उसे पढ़ता है।

आज मदर्स डे पर बहुत लोग अपनी माँ के साथ तस्वीरें डालेंगे, फूल देंगे, केक काटेंगे। यह सब सुंदर है। पर उससे भी अधिक सुंदर होगा यदि कोई बेटा वर्षों बाद माँ के पास बैठकर कहे – “आप थक गई होंगी न?”। यदि कोई बेटी माँ के बालों में तेल लगाते हुए पूछे – “आपने अपने लिए कब जिया था?”। यदि कोई व्यक्ति अपनी बूढ़ी माँ का हाथ पकड़कर कुछ देर बिना मोबाइल देखे बैठ जाए तो वही सबसे बड़ा उत्सव होगा।और यदि आपकी माँ अब इस दुनिया में नहीं हैं… तो आज उनकी तस्वीर के सामने चुपचाप बैठ जाइए। उनसे बात कीजिए। उन्हें बताइए कि उनकी डाँट अब याद आती है। उनका इंतज़ार याद आता है। उनके हाथ की रोटी याद आती है। विश्वास मानिए, माँ कभी पूरी तरह जाती नहीं। वह हमारे भीतर धड़कती रहती है।

शायद इसीलिए जब जीवन बहुत कठोर हो जाता है, आदमी अनजाने में “हे माँ…” कह उठता है। क्योंकि संसार में चाहे जितने रिश्ते बदल जाएँ, माँ अंतिम आश्रय बनी रहती है।माँ सचमुच वह शब्द है जिसके रहते मनुष्य कभी पूरी तरह अकेला नहीं होता… और जिसके चले जाने के बाद भी उसकी स्मृति आदमी को टूटने नहीं देती।इसलिए यदि आपकी माँ अभी जीवित हैं, तो आज केवल इतना कीजिए – उनके पास जाइए, उनके चरण छूइए, और बिना किसी कारण कह दीजिए – “माँ, तुम हो… इसलिए दुनिया अब भी सुंदर लगती है…”।

(डॉ. विनय कुमार वर्मा: लेखक, मोटिवेशनल स्पीकर, कवि, सीएमडी:सेंट्रल पब्लिक स्कूल ऑफ ग्रुप)

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