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सड़कें बढ़ती रहीं… और लोग उजड़ते रहे: डॉ. विनय कुमार वर्मा

चंदौली,यूपी:किसी भी नगर की आत्मा केवल उसकी सड़कें नहीं होतीं, उसकी आत्मा वे लोग होते हैं जो उन सड़कों के किनारे अपनी पूरी उम्र बसा देते हैं। जिनकी सुबह दुकान के शटर से शुरू होती है और रात दुकान की बत्ती बुझाने पर समाप्त। जिनकी पीढ़ियाँ किसी बाजार की धूल में पलती हैं। जिनकी पहचान किसी गली, किसी पटरी, किसी मोड़ से जुड़ जाती है। सड़कें केवल डामर और पत्थर की रेखाएँ नहीं होतीं, वे मनुष्यों के जीवन की रेखाएँ भी होती हैं। पर विडम्बना देखिए कि जब सड़कें चौड़ी होती हैं, तब सबसे पहले उन्हीं जीवन-रेखाओं पर बुलडोज़र चलाया जाता है जिन्होंने दशकों तक उस शहर को जीवित रखा।

मुगलसराय की जीटी रोड भी ऐसी ही एक कहानी कहती है। एक लंबी, ऐतिहासिक, थकी हुई सड़क, जिसने अंग्रेज़ों का समय देखा, बैलगाड़ियों की गति देखी, तांगे देखे, फिर ट्रक देखे, फिर भागती हुई आधुनिकता देखी। सड़क वही रही, केवल उसके किनारे बसने वाले चेहरे बदलते रहे। कभी वहाँ छोटे-छोटे खोखे बने, फिर पक्की दुकानें बनीं, फिर उनके ऊपर मकान बने। मंदिर बने, मस्जिदें बनीं, होटल बने, चाय की भट्टियाँ जलीं, बच्चों की किताबें बिकीं, किसी ने वहीं बैठकर अपनी बेटी की शादी की योजना बनाई, किसी ने बेटे को डॉक्टर बनाने का सपना देखा। धीरे-धीरे सड़क केवल मार्ग नहीं रही, पूरा जीवन बन गई।

फिर एक दिन शासन ने कहा -“यह अतिक्रमण है।”यह शब्द सुनने में जितना छोटा है, भीतर से उतना ही निर्दयी है। क्योंकि यह एक झटके में मनुष्य के पचास वर्षों के संघर्ष को “अवैध” घोषित कर देता है। जिस दुकान पर नगरपालिका ने वर्षों तक टैक्स लिया,जिसका बिजली कनेक्शन सरकार ने दिया, जिसका व्यापार लाइसेंस प्रशासन ने जारी किया, उसी दुकान के सामने अचानक लाल निशान बना दिया जाता है और कहा जाता है – “यह सरकारी भूमि पर है।”

*सवाल केवल इतना नहीं कि सड़क चौड़ी क्यों हो रही है। सड़क चौड़ी होनी चाहिए। विकास आवश्यक है। बढ़ती आबादी, बढ़ते वाहन, आधुनिक यातायात – सबके लिए चौड़ी सड़कें चाहिए। प्रश्न यह है कि इस विकास की पूरी कीमत केवल गरीब दुकानदार ही क्यों चुकाए? जिस शासन ने वर्षों तक इन निर्माणों को होते देखा, जिसने कर वसूला, जिसने मौन स्वीकृति दी, जिसकी फाइलों में सब दर्ज रहा – उसकी कोई जवाबदेही क्यों नहीं?*

अगर लोक निर्माण विभाग 1854 से अस्तित्व में है, तो वह तब कहाँ था जब सड़क की भूमि पर निर्माण हो रहे थे? अगर निर्माण गलत थे, तो उसी समय क्यों नहीं रोके गए?

यदि नगरपालिका परिषद ने दक्षिण पटरी की दुकानों को स्वयं लोक निर्माण विभाग से लीज पर लेकर लोगों को आवंटन किया, बाद में रजिस्ट्री तक की, किराया लिया, टैक्स वसूला – तो आज वे लोग अचानक अपराधी कैसे हो गए? क्या जनता ने स्वयं सरकारी फाइलें बनाईं थीं? क्या जनता ने स्वयं अपनी दुकानों को वैध घोषित किया था? नहीं। यह सब शासन और प्रशासन की निगरानी में हुआ। फिर सारी सज़ा केवल जनता को क्यों?

वास्तव में यह केवल सड़क का प्रश्न नहीं, यह शासन की नैतिक जिम्मेदारी का प्रश्न है। विकास तब तक अधूरा है जब तक उसमें मनुष्य की संवेदना शामिल न हो। यदि सड़क चौड़ी करने के लिए किसी की पूरी आजीविका छिन रही है, तो उसकी भरपाई करना शासन का कर्तव्य है, दया नहीं। क्योंकि नुकसान केवल दीवारों का नहीं होता। एक दुकान टूटती है तो उसके साथ किसी परिवार का आत्मविश्वास टूटता है। किसी बूढ़े पिता की जीवनभर की कमाई मिट्टी में मिलती है। किसी बच्चे की पढ़ाई खतरे में पड़ती है। किसी बेटी की शादी रुक जाती है। किसी घर का चूल्हा बुझ जाता है।

अक्सर प्रशासन कह देता है -“नोटिस दिया गया था।” पर क्या केवल नोटिस देना पर्याप्त है? क्या संवैधानिक शासन का दायित्व केवल सूचना चस्पा कर देना भर है? यदि सरकार जनता से टैक्स लेती है, तो जनता के पुनर्वास की जिम्मेदारी भी उसी की है। दुनिया के अनेक देशों में सड़क विस्तार के दौरान प्रभावित व्यापारियों को मुआवज़ा, वैकल्पिक दुकानें, पुनर्वास क्षेत्र और आर्थिक सहायता दी जाती है। क्योंकि सभ्य शासन समझता है कि विकास मनुष्यों के लिए होता है, मनुष्यों के विरुद्ध नहीं।

सबसे पीड़ादायक दृश्य वह होता है जब वर्षों पुरानी दुकान के सामने बुलडोज़र खड़ा होता है। दुकान का मालिक हाथ जोड़कर कहता है – “साहब, दो दिन और दे दीजिए…” और मशीनें बिना भाव के दीवार गिरा देती हैं। ईंटें टूटती हैं, पर उससे अधिक टूटता है मनुष्य का विश्वास। वही विश्वास जो उसने दशकों तक शासन पर रखा था।

विडम्बना देखिए, जिन नगरपालिका ने वर्षों तक जिन निर्माणों से टैक्स वसूला, वही अब उन्हें अवैध कह रही हैं। यदि कोई निर्माण अवैध था, तो उस पर कर क्यों लिया गया? बिजली-पानी का कनेक्शन क्यों दिया गया? व्यापार लाइसेंस क्यों जारी हुए? और यदि सब कुछ वैध प्रक्रिया से हुआ था, तो फिर अचानक अवैध घोषित करने का नैतिक अधिकार किस आधार पर उत्पन्न होता है?

यह प्रश्न केवल कानून का नहीं, न्याय का है। कानून कभी-कभी कठोर हो सकता है, पर न्याय हमेशा मानवीय होना चाहिए। शासन का धर्म केवल सड़क बनाना नहीं, समाज को सुरक्षित रखना भी है। यदि सड़क चौड़ी हो और उसके किनारे बैठे लोग भूखे हो जाएँ, तो वह विकास अधूरा है। यदि शहर सुंदर दिखे लेकिन उसके पुराने व्यापारी उजड़ जाएँ, तो वह सौंदर्य संवेदनहीनता का प्रतीक बन जाता है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि शासन, प्रशासन, लोक निर्माण विभाग और नगरपालिका परिषद इस पूरे प्रश्न को केवल तकनीकी दृष्टि से न देखें। फाइलों और नक्शों से बाहर निकलकर उन चेहरों को भी देखें जिनकी आँखों में भविष्य का डर है। जिनकी जिंदगी की पूरी पूँजी एक दुकान में लगी थी। जिनकी पीढ़ियाँ उसी व्यापार पर निर्भर थीं।

यदि अतिक्रमण हटाना अनिवार्य है, तो पुनर्वास भी अनिवार्य होना चाहिए। यदि सरकार बाजार तोड़ रही है, तो उसे वैकल्पिक बाजार भी बनाना चाहिए। यदि किसी व्यापारी की पूरी दुकान सड़क में चली गई, तो उसे नई दुकान या उचित मुआवज़ा मिलना चाहिए। क्योंकि संविधान केवल राज्य को अधिकार नहीं देता, नागरिकों को गरिमा के साथ जीने का अधिकार भी देता है।*

शहर केवल सीमेंट से नहीं बनते। शहर स्मृतियों से बनते हैं। किसी पुराने बाजार की टूटी हुई दुकान के साथ एक पूरा इतिहास टूटता है। वह दुकान केवल व्यापार नहीं है – वह किसी परिवार की पहचान है । वहाँ बैठा दुकानदार केवल व्यापारी नहीं है – वह उस शहर की धड़कन है ।

विकास का सही अर्थ वही है जिसमें सड़क भी बचे और आदमी भी। मशीनें भी चलें और संवेदनाएँ भी। शासन की असली महानता बुलडोज़र की ताकत में नहीं, टूटे हुए नागरिक को फिर से खड़ा कर देने की क्षमता में होती है।

आज मुगलसराय जैसे नगरों में जो कुछ हो रहा है, वह केवल सड़क चौड़ीकरण की कहानी नहीं, यह उस संघर्ष की कहानी है जहाँ विकास और मनुष्यता आमने-सामने खड़े दिखाई देते हैं और इतिहास गवाह है – जब भी विकास ने मनुष्य को कुचला है, समाज भीतर से खोखला हुआ है।

इसलिए अभी भी समय है। शासन सुन ले, प्रशासन समझ ले, लोक निर्माण विभाग आत्ममंथन करे, नगरपालिका परिषद अपने अतीत को याद करे। क्योंकि जनता केवल आँकड़ा नहीं होती। जनता ही नगर है, जनता ही बाजार है, जनता ही सड़क है, और जनता ही राष्ट्र है। यदि विकास के नाम पर जनता रो रही हो, तो कहीं न कहीं विकास की परिभाषा अधूरी है।*

(डॉ. विनय कुमार वर्मा:लेखक,कवि, मोटिवेशनल स्पीकर,सीएमडी, सेंट्रल पब्लिक स्कूल ऑफ ग्रुप)

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