लोक पर्व छठ-सूर्योपासना की अलौकिक परम्परा: डॉ. विनय कुमार वर्मा

चंदौली,यूपी: चेतना मंच के संस्थापक,लेखक,कवि, वरिष्ठ पत्रकार,सीपीएस स्कूल के सीएमडी डॉ विनय कुमार वर्मा ने छठ के महत्व को अपने शब्दों के माध्यम से बताया कि साँझ का सूरज जैसे ही क्षितिज की बाँहों में उतरने लगता है, गंगा या तालाब के किनारे खड़ा जनसमूह अचानक एक लय में झूम उठता है – “छठ मइया के जय हो!”
मिट्टी की सुगंध, आरती की थाली, डूबते सूरज को नमन करती महिलाएँ, और बच्चों की आँखों में कौतुक- यही वह क्षण है जहाँ श्रद्धा, संस्कृति और विज्ञान एक साथ दिखाई देते हैं। छठ पर्व भारत की उन जीवंत परम्पराओं में से है जो धर्म नहीं, अनुभव का उत्सव है- सूर्य की रोशनी में आत्मा की ज्योति खोजने का पर्व।
छठ पूजा की जड़ें वैदिक काल तक जाती हैं। ऋग्वेद में सूर्य देव को “सविता” कहा गया है जो समस्त जीवन के प्रेरक हैं। “तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि” – यही गायत्री मंत्र इस परम्परा का हृदय है।
छठ में जब व्रती स्त्रियाँ डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य देती हैं, तो वह केवल एक देवता को नहीं, बल्कि सृष्टि के जीवन- स्रोत को प्रणाम करती हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, सूर्य देव की बहन “छठी मइया” बच्चों की रक्षिका हैं। महाभारत के अनुशासन पर्व में उल्लेख है कि कर्ण, जो सूर्यपुत्र थे, प्रतिदिन अर्घ्य देकर सूर्य की उपासना करते थे – वह “सूर्यस्नान” की परम्परा का आदि रूप था। कहा जाता है कि द्रौपदी ने भी छठ व्रत रखा था, जिससे पांडवों को पुनः राज्य प्राप्त हुआ।
किंवदंतियों में यह भी है कि श्रीराम और सीता ने लंका विजय के बाद अयोध्या लौटकर कार्तिक शुक्ल षष्ठी को सूर्योपासना की – यही छठ का आरंभिक संस्कार बना। इतिहासकारों के अनुसार, छठ का विकास मगध-कोशल-मिथिला क्षेत्र में हुआ…वह भूमि जहाँ कर्ण ने दान का आदर्श, सीता ने धरती से संवाद और गौतम बुद्ध ने ध्यान का मार्ग दिखाया।
यह कृषि संस्कृति की जननी रही – इसलिए सूर्य, जल और भूमि का पूजन यहाँ जीवन का स्वाभाविक हिस्सा बन गया। छठ केवल पौराणिक नहीं, लोक-आस्था की रीढ़ है।इसने धर्म की कठोरता को तोड़कर श्रद्धा को सहजता दी।यहाँ कोई ब्राह्मण-पुरोहित की अनिवार्यता नहीं,कोई वैदिक संस्कार नहीं,बस मिट्टी का दीया, बाँस की सूप, और आस्था का उजाला।
यही इसकी सबसे बड़ी शक्ति है – धर्म से परे, लोक के भीतर। छठ ने सदियों की धार्मिक बेड़ियाँ भी तोड़ीं – जहाँ स्त्री केवल पूजक नहीं, बल्कि सृष्टि- संरक्षिका के रूप में प्रतिष्ठित हुई। वह व्रती नहीं, साधिका बनी; दाता नहीं, जगदम्बा का रूप। छठ ने स्त्री को समाज के धार्मिक आँगन में अग्रस्थान दिया – वह लोकधर्म की प्रतिनिधि बनी, जिसने पूजा को कर्म से जोड़ा और श्रद्धा को समानता का रूप दिया।
लोक में छठ का अर्थ है – माँ की पुकार, पुत्र की प्राप्ति और परिवार की समृद्धि।कई लोककथाएँ कहती हैं कि निःसंतान स्त्रियों ने छठ मइया की आराधना से संतान प्राप्त की। यह पर्व केवल पुत्र- कामना का प्रतीक नहीं, बल्कि नवजीवन की प्राप्ति का भी संकेत है – जहाँ संतान का अर्थ वंश से नहीं, सृजन से है।मिथिला और मगध में प्रचलित गीतों में यह भाव अनगिनत बार आता है – “छठी मईया तोहर महिमा अपरम्पार…”
यह लोकगीत मातृत्व और करुणा के गूढ़ स्वर हैं,जहाँ माँ और प्रकृति एकाकार होती हैं। छठ पर्व का अनुशासन योगसाधना जैसा है। चार दिनों की यह यात्रा मनुष्य को देह से आत्मा तक ले जाती है:-
पहला: नहाय-खाय… शुद्धि और संयम का आरंभ। स्नान और सात्विक भोजन के साथ मन का शोधन।
दूसरा: खरना… एकांत में खीर-रोटी का प्रसाद। यह आत्म–संवाद की संध्या है, जहाँ व्रती भीतर उतरता है।
तीसरा: संध्या अर्घ्य…डूबते सूर्य को नमन। जीवन के क्षय में भी कृतज्ञता का भाव; स्वीकार का दर्शन।
चौथा: उषा अर्घ्य… उगते सूर्य को अर्घ्य। यह पुनर्जन्म है – आशा, ऊर्जा और नये संकल्प का।
इन चार दिनों में व्यक्ति अहंकार से आस्था, इच्छा से शांति की ओर बढ़ता है। छठ की पहचान उसकी सादगी है। न कोई दिखावा, न आडंबर। बस मिट्टी के दीये, बाँस की सूप, ठेकुआ की सुगंध, गन्ने की मिठास और व्रती के चेहरे पर शांति की झिलमिलाहट।यह एक ऐसा उत्सव है जहाँ हर वस्तु प्रकृति का प्रतीक है-मिट्टी से बना दिया, बाँस से बनी सूप, फल और जल -मानो मनुष्य कह रहा हो, “मैं धरती का अंश हूँ, उसी से पूजा करता हूँ।” छठ के गीत उसकी आत्मा हैं- “कांच ही बांस के बहंगिया…” या “उठू हे सूरज देव, अरघ देबे आई…”इन लोकगीतों में नारी की प्रार्थना और धरती की आवाज़ दोनों हैं।ये गीत भक्ति नहीं, जीवन का संगीत हैं।
छठ का सबसे बड़ा आकर्षण है – उसका समावेशी चरित्र। यह वह पर्व है जहाँ न कोई ऊँच–नीच है, न कोई धर्म–भेद। हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई – सभी इसमें सम्मिलित होते हैं। बिहार, झारखण्ड, पूर्वांचल, नेपाल – सब जगह एक ही लय में आवाज़ उठती है –
छठ ने समाज को सिखाया कि श्रद्धा निजी हो सकती है, पर उत्सव सामूहिक होना चाहिए। यह सामाजिक संवाद की पुनर्स्थापना है – जहाँ जाति और वर्ग की दीवारें श्रद्धा की रोशनी में पिघल जाती हैं।
आज छठ सीमाओं से परे पहुँच गया है। दिल्ली, मुंबई, चेन्नई से लेकर दुबई, कतर, लंदन और न्यूयॉर्क तक – हर जगह भारतीय प्रवासी गंगा का प्रतीक जल लेकर सूर्य को अर्घ्य देते हैं।
यह न केवल धार्मिक पर्व है, बल्कि सांस्कृतिक एकता का प्रतीक भी बन चुका है।जहाँ भी भारतीय हैं, वहाँ सूर्य की ओर झुके हुए हाथ हैं।छठ अब केवल बिहार का पर्व नहीं, भारत का परिचय है।
छठ तीन धाराओं का संगम है – धर्म, विज्ञान और कला। धर्म इसे श्रद्धा देता है,विज्ञान इसे तर्क देता है,और कला इसे भाव देता है।
सूर्योपासना शरीर में विटामिन–डी की पूर्ति करती है, जल में खड़े रहना मन–तन के संतुलन को साधता है,और उपवास शरीर को शुद्ध करता है। यह योग, चिकित्सा और ध्यान का सम्मिलित रूप है – बिना शास्त्र कहे शास्त्र का पालन।
छठ का सार यही है –
“प्रकाश केवल बाहर नहीं, भीतर भी उगना चाहिए।”सूर्य के उगने और डूबने में जीवन का पूरा दर्शन छिपा है-एक ओर श्रम, संघर्ष और आशा का प्रतीक,दूसरी ओर स्वीकार, विश्रांति और कृतज्ञता का भाव।जब कोई व्रती जल में खड़ी होकर सूर्य को नमन करती है,
तो वह कहती है -“हे सूर्यदेव! मेरे भीतर भी वही प्रकाश जगाओ, जो तुम्हारी किरणों में है।” छठ केवल एक त्योहार नहीं, यह भारतीय आत्मा का उत्सव है -जहाँ मिट्टी और मन, सूर्य और आत्मा, श्रद्धा और विज्ञान – सब एक हो जाते हैं।
“छठ – जहाँ सूर्य की किरणें नहीं, श्रद्धा का प्रकाश जगमगाता है।”



