शिक्षा

वर्दी की अकड़ अब कैमरे के घेरे में जिसे बदलना पड़ेगा चेहरा:डॉ. विनय कुमार वर्मा

चंदौली,यूपी: कभी वर्दी देखकर लोग सिहर उठते थे – वह भय था, अनुशासन का भी और अन्याय का भी। आज वही वर्दी मोबाइल कैमरे की चमक में खड़ी है जैसे समय ने उसे आईना दिखा दिया हो।सड़क पर हर मोड़ पर, हर चौक पर अब एक नया समीकरण जन्म ले चुका है – पुलिस और जनता के बीच। पहले जहाँ डंडे की गूंज न्याय की भाषा मानी जाती थी, आज कैमरे की क्लिक ने उसे प्रश्नों की भाषा में बदल दिया है।      कभी किसी की गलती केवल हवा में फैलती थी – सुनी-सुनाई, अधूरी, संदिग्ध। अब वही गलती वीडियो के रूप में अमर हो जाती है।

एक छोटा-सा मोबाइल, एक अनजान राहगीर, और फिर एक झटके में पूरा दृश्य – “पुलिस ने गलत किया” या “जनता ने उकसाया” – तय करने के लिए हजारों आँखें ऑनलाइन हो जाती हैं।यह नया युग है दृश्य प्रमाण का युग, जहाँ हर हरकत की गवाही दी जा सकती है, हर आवाज़ न्यायालय की दीवारों तक पहुँच सकती है।कभी पुलिस “प्रमाण” मांगती थी, अब समाज “प्रमाण” दिखाता है   वर्दी हमेशा से शक्ति का प्रतीक रही है – पर शक्ति जब अहं में बदल जाती है, तब उसका तेज़ भी कलंकित हो जाता है। हमारे समाज में पुलिस कभी “संरक्षक” नहीं, “भय का नाम” बन गई थी।

गली के बच्चे जब किसी सिपाही को आते देखते थे, तो चुप हो जाते थे – मानो कोई देवता नहीं, देवदूत उतर आया हो जो गलती पर दंड देगा।पर अब हवा बदल चुकी है।अब जनता जान चुकी है कि पुलिस “सरकार नहीं”, “सरकार का सेवक” है।

वह कहती है – “आप वेतन हमारे कर से लेते हैं, तो हमें अपमान क्यों देते हैं?”यह स्वर नया है – पर सच्चा है।यह वही चेतना है जो समाज को लोकतांत्रिक बनाती है।अब भय नहीं, संवाद चाहिए; धमकी नहीं, समझदारी चाहिए; आदेश नहीं, सहयोग चाहिए।

पुलिस के सामने आज दोहरी चुनौती है। पहला – अपना व्यवहार बदलने की चुनौती; दूसरा – अपनी ईमानदारी सिद्ध करने की चुनौती।पहली चुनौती मनोवैज्ञानिक है। भाषा बदलनी होगी – आदेश की जगह आग्रह, गाली की जगह संवाद। थप्पड़ की जगह शब्द रखिए – वह ज़्यादा असर करेगा।

दूसरी चुनौती नैतिक है। रिश्वत के हर नोट के पीछे अब कैमरे का डर है। वह मोबाइल अब जेब में नहीं, नियति में बैठ चुका है। जो अधिकारी “सिस्टम” को घर समझकर मनमानी करते थे, उन्हें अब एक बटन दबते ही जनता अदालत में खड़ा कर देती है।यह भय नहीं, यह जागरूकता है और यह वही दर्पण है जिसमें सुधार की संभावना छिपी है।         पुलिस यदि स्वयं को सुधारना चाहती है, तो उसे तीन चीज़ें अपनानी होंगी -सम्मान की भाषा, पारदर्शी प्रक्रिया और आत्म-संयम।

सम्मान की भाषा- क्योंकि कठोर स्वर अब अधिकार नहीं, अपराध बन गया है।पारदर्शी प्रक्रिया – क्योंकि नियमों की पारदर्शिता ही जनता के भरोसे की जड़ है।और आत्म-संयम – क्योंकि शक्ति का सही प्रयोग वहीं है जहाँ वह सीमाओं में रहे।अक्सर देखने में आता है – पुलिस की गाड़ियों में स्वयं चालक बिना हेलमेट या सीट बेल्ट के होते हैं, पर वही लोग नागरिकों को प्रवचन देते हैं।

जनता जब यह दोहरा व्यवहार देखती है तो भीतर से व्यवस्था से मोहभंग हो जाता है।ईमानदारी केवल शब्द नहीं, आदत बननी होगी – वरना हर भाषण खोखला लगेगा।

अब एक वीडियो आते ही सोशल मीडिया न्याय कर देता है। लाखों टिप्पणियाँ, निर्णय और गालियाँ सब कुछ कुछ ही घंटों में तय हो जाता है। पर हर वीडियो पूरा सच नहीं होता। कई बार सिपाही का संयम दिखाने वाला भाग काट दिया जाता है, और जनता की उकसाहट छिपा दी जाती है। इसलिए जनता और पुलिस – दोनों को मीडिया साक्षरता की ज़रूरत है।

कैमरा न्याय का साधन बने, भावनाओं की आग न बने।हर वीडियो से पहले विवेक चाहिए – हर टिप्पणी से पहले धैर्य चाहिए।     यदि पुलिस वाक़ई अपने समाज में सम्मान पाना चाहती है, तो उसे अपने “रोल” नहीं, अपनी “आत्मा” बदलनी होगी। पुलिस को लोगों के दिलों में डर नहीं, भरोसा जगाना होगा। थाने को दहशत का नहीं, राहत का स्थान बनाना होगा। हर मुस्कान, हर नम्रता, हर शांत जवाब – यही भविष्य की पुलिसिंग है।

जनता अब सिर्फ़ अनुशासन नहीं, संवेदना चाहती है।क्योंकि वही नागरिक अब कैमरा नहीं, चेतना लेकर खड़ा है।  समय का यह नया मोड़ किसी परीक्षा से कम नहीं।वर्दी अब केवल आदेश का प्रतीक नहीं, जिम्मेदारी का आईना है और यह आईना हर दिन चमक रहा है – मोबाइल की स्क्रीन पर, समाज की आँखों में, और हर नागरिक के दिल में। जब पुलिस के स्वर में करुणा होगी, जनता का उत्तर श्रद्धा होगा। जब पुलिस अपने अधिकार को कर्तव्य मानेगी, जनता उसका सम्मान करेगी।

और जब वर्दी मुस्कुराएगी – तब समाज वास्तव में सुरक्षित महसूस करेगा     ये बातें उस बदलते समय का चित्र है जब कैमरा न्याय का साक्षी बन गया है।

पुलिस के लिए यह चुनौती है – खुद को फिर से परिभाषित करने की। अब “भय” नहीं, “विश्वास” चाहिए; अब “आदेश” नहीं, “संवाद” चाहिए; अब “वर्दी” नहीं, “मनुष्य” चाहिए। जब पुलिस अपने भीतर के मनुष्य को पहचान लेगी, तब समाज उसे केवल कानून का रक्षक नहीं – लोक का मित्र कहेगा।

(डॉ विनय कुमार वर्मा)

लेखक,कवि,वरिष्ठ पत्रकार,सीएमडी:सीपीएस स्कूल

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