नेताजी वह आग जो आज भी बुझी नहीं है: डॉ.विनय कुमार वर्मा

चंदौली, यूपी: कुछ व्यक्तित्व इतिहास में नहीं रहते, वे समय के भीतर धड़कते रहते हैं। नेताजी सुभाषचंद्र बोस ऐसे ही व्यक्तित्व थे- जिन्हें किसी कालखंड में बाँधा नहीं जा सकता। वे केवल स्वतंत्रता आंदोलन के एक नेता नहीं थे, वे उस अधूरे स्वप्न की आवाज़ थे जिसे भारत ने बहुत पहले देख लिया था, पर पूरी तरह जी नहीं पाया। उनकी छवि तस्वीरों में भले ही धुंधली पड़ जाए, पर उनकी चेतना आज भी देश की नसों में एक अनकही बेचैनी बनकर बहती है। जब भी राष्ट्र अपने आत्मसम्मान, साहस और निर्णायकता को लेकर प्रश्न करता है, नेताजी स्वतः स्मरण में आ जाते हैं- एक प्रश्न की तरह, एक चुनौती की तरह।
नेताजी का जीवन किसी सधे हुए राजनीतिक जीवनचरित जैसा नहीं था। उसमें व्यवस्था की सहजता नहीं, बल्कि विद्रोह की बेचैनी थी। वे ऐसे विद्यार्थी थे जिन्हें आराम से आईसीएस की कुर्सी मिल सकती थी और ऐसे प्रशासक भी हो सकते थे जिनका भविष्य सुरक्षित, सम्मानजनक और शांत होता। पर उनके भीतर का भारत इस शांति को स्वीकार नहीं कर सका। जिस दिन उन्होंने ब्रिटिश शासन की सेवा छोड़ने का निर्णय लिया, वह केवल एक नौकरी से त्याग नहीं था- वह उस मानसिक गुलामी से मुक्ति थी जिसे कई शिक्षित भारतीय तब भी स्वाभाविक मान चुके थे। उस एक निर्णय में उनका संपूर्ण दर्शन छिपा था कि व्यक्तिगत उन्नति का कोई मूल्य नहीं, यदि राष्ट्र पराधीन हो।
नेताजी की सोच का मूल तत्व था-सम्मान। वे दया से मिलने वाली स्वतंत्रता में विश्वास नहीं करते थे। उन्हें याचना का मार्ग कमजोर लगता था और प्रतीक्षा का मार्ग अपमानजनक। उनके लिए स्वतंत्रता कोई अनुदान नहीं थी, वह अधिकार थी और अधिकार मांगकर नहीं, छीनकर लिए जाते हैं। यही कारण है कि वे उस समय के मुख्यधारा आंदोलन से अलग खड़े दिखाई देते हैं। वे टकराव से डरते नहीं थे, क्योंकि उन्हें पता था कि इतिहास विनम्रता से नहीं, साहस से दिशा बदलता है। उनकी दृष्टि में स्वतंत्रता केवल राजनीतिक सत्ता का हस्तांतरण नहीं थी, बल्कि राष्ट्रीय आत्मा का पुनर्जागरण था।
उनकी वाणी में जो आग थी, वह केवल भाषणों तक सीमित नहीं थी। वह उनके हर निर्णय में, हर यात्रा में, हर जोखिम में दिखाई देती है। कारावास, नजरबंदी, पलायन, गुप्त यात्राएँ- यह सब किसी रोमांचक कथा का हिस्सा नहीं, बल्कि उस संकल्प के प्रमाण थे जो किसी भी कीमत पर रुकने को तैयार नहीं था। जब वे कैद से निकलकर अज्ञात मार्गों से विदेश पहुँचे, तब वे एक व्यक्ति नहीं थे- वे उस भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे थे जो स्वयं अपने लिए लड़ना चाहता था। उनका पलायन डर से नहीं, रणनीति से उपजा था।
नेताजी का सबसे बड़ा योगदान केवल आज़ाद हिंद फौज का गठन नहीं था, बल्कि भारतीय मानस को यह विश्वास दिलाना था कि भारतीय भी संगठित हो सकते हैं, अनुशासित हो सकते हैं और बलिदान दे सकते हैं। उन्होंने गुलामी के वर्षों में कुचले गए आत्मविश्वास को पुनर्जीवित किया। आज़ाद हिंद फौज की पंक्तियों में केवल सैनिक नहीं खड़े थे, वहाँ एक नई भारतीय पहचान आकार ले रही थी- ऐसी पहचान जो जाति, भाषा और प्रांत से ऊपर उठकर केवल भारत बनना चाहती थी। उनके लिए सेना केवल हथियारबंद संगठन नहीं थी, वह राष्ट्रीय चरित्र की प्रयोगशाला थी।
उनका प्रसिद्ध नारा कोई भावुक उद्घोष मात्र नहीं था। वह एक स्पष्ट अनुबंध था- नेताजी जनता से बलिदान माँगते थे, बदले में स्वतंत्रता का वचन देते थे। उसमें कोई छल नहीं, कोई अस्पष्टता नहीं थी। यह सीधा, कठोर और ईमानदार संवाद था। शायद यही कारण है कि वे युवाओं को विशेष रूप से आकर्षित करते थे। युवावस्था को वे केवल उम्र नहीं, ऊर्जा मानते थे और ऊर्जा को वे आंदोलन का ईंधन बनाना जानते थे। उनके लिए युवा वह शक्ति थे जो यदि सही दिशा पा जाएँ, तो इतिहास की धारा मोड़ सकती है।
नेताजी की दृष्टि में भारत केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं था। वह एक सभ्यता था- अनुशासन, त्याग और सामूहिकता पर आधारित। वे पश्चिम से तकनीक और संगठन सीखने को तैयार थे, पर मानसिक गुलामी को स्वीकार करने को नहीं। उनका राष्ट्रवाद संकीर्ण नहीं था, उसमें मानवता के प्रति सम्मान था। वे जानते थे कि स्वतंत्र भारत को केवल अंग्रेज़ों से नहीं, बल्कि अपनी आंतरिक कमजोरियों से भी लड़ना होगा। इसलिए वे भविष्य के भारत की कल्पना करते समय सामाजिक न्याय, आर्थिक आत्मनिर्भरता और राष्ट्रीय एकता पर बल देते थे।
उनकी विचारधारा को किसी एक खाँचे में बंद करना कठिन है। वे न तो केवल क्रांतिकारी थे, न केवल समाजवादी, न केवल राष्ट्रवादी। वे परिस्थिति के अनुसार निर्णय लेने वाले यथार्थवादी थे। उनके लिए विचार साधन थे, साध्य नहीं। साध्य था- स्वतंत्र, शक्तिशाली और सम्मानित भारत। यही लचीलापन उन्हें कई बार विवादास्पद बनाता है, पर यही उन्हें अद्वितीय भी बनाता है। वे किसी सिद्धांत के दास नहीं थे, वे भारत के सेवक थे।
नेताजी का जीवन हमें यह भी सिखाता है कि असहमति राष्ट्रद्रोह नहीं होती। उन्होंने अपने समय के अनेक नेताओं से मतभेद रखे, पर उनके मन में कभी भारत के प्रति द्वेष नहीं था। वे आलोचना करते थे, पर उद्देश्य एक ही था। आज के समय में, जब असहमति को संदेह की दृष्टि से देखा जाता है, नेताजी की यह विरासत और भी प्रासंगिक हो जाती है। उन्होंने यह दिखाया कि राष्ट्र के प्रति निष्ठा का अर्थ मौन नहीं, बल्कि साहसिक संवाद भी हो सकता है।
उनकी रहस्यमयी अंतकथा आज भी प्रश्नचिह्न बनी हुई है। पर शायद यही रहस्य उन्हें इतिहास से अधिक मिथक बना देता है। कुछ व्यक्तित्वों का अंत स्पष्ट नहीं होता, क्योंकि उनका प्रभाव समाप्त नहीं होता। नेताजी भी ऐसे ही हैं- उनकी मृत्यु से अधिक महत्वपूर्ण उनका जीवन है और उनके जीवन से अधिक महत्वपूर्ण उनका विचार। वे आज भी प्रश्न करते हैं- क्या हम वास्तव में स्वतंत्र हैं, या केवल शासक बदल गए हैं? क्या हमारा आत्मसम्मान जाग्रत है, या हम सुविधाओं के बदले चुप हैं?
नेताजी हमें असुविधाजनक सत्य से रूबरू कराते हैं। वे हमें याद दिलाते हैं कि स्वतंत्रता केवल अधिकार नहीं, जिम्मेदारी भी है कि राष्ट्रप्रेम केवल नारों से नहीं, कर्म से सिद्ध होता है। कि इतिहास बहानों को नहीं, बलिदान को याद रखता है। उनके जीवन में कोई आसान रास्ता नहीं था और शायद यही कारण है कि वे आज भी हमारे लिए चुनौती बने हुए हैं। वे हमें प्रेरित करते हैं, पर साथ ही असहज भी करते हैं- क्योंकि उनका जीवन हमें हमारे समझौतों का आईना दिखाता है।
आज जब भारत विश्व पटल पर अपनी पहचान गढ़ रहा है, नेताजी का स्मरण केवल अतीत की श्रद्धांजलि नहीं, भविष्य की तैयारी भी है। उनकी सोच हमें यह सिखाती है कि आत्मनिर्भरता केवल आर्थिक शब्द नहीं, बल्कि मानसिक अवस्था है। कि नेतृत्व का अर्थ केवल पद नहीं, बल्कि जोखिम उठाने की क्षमता है कि राष्ट्र निर्माण में भावनाएँ आवश्यक हैं, पर निर्णय उससे भी अधिक आवश्यक हैं।
नेताजी सुभाषचंद्र बोस को याद करना किसी मूर्ति के आगे सिर झुकाना नहीं होना चाहिए। उन्हें याद करना अपने भीतर उस आग को पहचानना है जो अन्याय से प्रश्न करती है, जो भय से इनकार करती है और जो सुविधा के विरुद्ध खड़ी होती है। वे हमें यह सिखाते हैं कि इतिहास उन लोगों को नहीं बदलता जो सुरक्षित रहते हैं, बल्कि उन्हें बदलता है जो जलने का साहस रखते हैं। शायद इसी कारण नेताजी आज भी केवल स्मृति नहीं, चेतावनी हैं कि स्वतंत्रता यदि सजग न रहे, तो धीरे-धीरे अर्थहीन हो जाती है।
नेताजी का जीवन उतार – चढ़ाव से से भरा है- कहीं तीखा, कहीं करुण, कहीं तेज़, कहीं रहस्यमय। उसमें पूर्णविराम कम हैं, प्रश्न अधिक हैं और शायद यही उसकी सबसे बड़ी सुंदरता है। क्योंकि कुछ जीवन उत्तर देने के लिए नहीं, बल्कि सोचने के लिए होते हैं। नेताजी सुभाषचंद्र बोस भी ऐसे ही जीवन हैं जो आज भी हमसे पूछते हैं, “तुम आज़ाद होकर क्या कर रहे हो?
(डॉ विनय कुमार वर्मा, सीएमडी सीपीएस ग्रुप ऑफ स्कूल/लेखक/कवि/स्वतंत्र पत्रकार)



