शिक्षा

जहाँ मन न मिले, वहाँ मोड़ अच्छा: डॉ. विनय कुमार वर्मा

चंदौली,यूपी: जीवन में हर रिश्ता निभाने के लिए नहीं आता। कुछ रिश्ते हमें प्रेम सिखाते हैं, कुछ धैर्य, कुछ विश्वास और कुछ यह समझ देते हैं कि समय रहते पीछे हट जाना भी जीवन की एक आवश्यक कला है।        मनुष्य की सबसे बड़ी कठिनाइयों में से एक यह है कि वह टूटे हुए संबंधों को भी लंबे समय तक अपने कंधों पर ढोता रहता है। केवल इसलिए कि कभी वे संबंध सुंदर थे। केवल इसलिए कि कभी उनमें अपनापन था। केवल इसलिए कि कभी हमने किसी को अपना माना था।

लेकिन जीवन केवल स्मृतियों के आधार पर नहीं चलता। रिश्ते वर्तमान में जीते हैं। और वर्तमान यदि विषाक्त हो चुका हो, यदि किसी के मन में हमारे प्रति निरंतर नकारात्मकता, कटुता, ईर्ष्या, अविश्वास या दुर्भावना घर कर चुकी हो, तो केवल पुराने दिनों के सम्मान में उस संबंध को ढोते रहना बुद्धिमत्ता नहीं है।       *संबंधों की भी एक आयु होती है*। कुछ संबंध जीवन भर चलते हैं। कुछ किसी मोड़ तक साथ आते हैं। कुछ अपना पाठ पढ़ाकर आगे बढ़ जाते हैं। और कुछ ऐसे भी होते हैं जिन्हें हम छोड़ते नहीं, इसलिए वे धीरे-धीरे हमारे भीतर नासूर बन जाते हैं।

कुछ चीजें स्पष्ट होनी चाहिए।  जीवन केवल मौन का नाम नहीं है। कभी-कभी स्पष्टता ही मन की मुक्ति होती है।यदि आपको स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि सामने वाला व्यक्ति आपके प्रति सम्मान नहीं रखता, आपके सुख से प्रसन्न नहीं होता, आपकी प्रगति से असहज है, लगातार आपके बारे में नकारात्मक सोचता है, आपकी अनुपस्थिति में आपके विरुद्ध बोलता है, आपकी उपस्थिति में औपचारिक प्रेम दिखाता है और भीतर से आपके हित का इच्छुक नहीं है- तो वहाँ आँख बंद करके संबंध निभाना स्वयं के प्रति अन्याय है। हर संबंध के पीछे एक न्यूनतम नैतिकता होती है-

सम्मान…

विश्वास…

सद्भाव…

इन तीनों में से यदि कुछ भी शेष न रहे, तो संबंध का बाहरी ढाँचा भले बचा रहे, उसका प्राण जा चुका होता है। मृत संबंधों को जीवित दिखाने की कोशिश मनुष्य को भीतर से थका देती है।

हमारे समाज ने रिश्ते निभाने की शिक्षा तो बहुत दी, रिश्तों की सीमा तय करने की शिक्षा बहुत कम दी। हमें बचपन से कहा गया-सहन करो। झुको।बात मत बढ़ाओ। अपना समझकर छोड़ दो।…लेकिन हर बार छोड़ देना समाधान नहीं होता।         कई बार यही “छोड़ देना” सामने वाले के भीतर यह विश्वास पैदा कर देता है कि आप कुछ भी सह लेंगे।यहीं से संबंध असंतुलित होने लगते हैं। एक व्यक्ति लगातार आहत करता है।दूसरा लगातार सहता है।एक बोलता है। दूसरा चुप रहता है। एक सीमाएँ तोड़ता है। दूसरा रिश्ते बचाता है। और अंत में रिश्ते तो फिर भी नहीं बचते, केवल सहने वाला व्यक्ति भीतर से टूट जाता है।

इसलिए जीवन में एक समय ऐसा आना चाहिए जब हम स्वयं से पूछें-मैं इस संबंध को क्यों निभा रहा हूँ?प्रेम के कारण?दायित्व के कारण?या केवल इसलिए कि मुझे संबंध टूटने का अपराधबोध है?यह प्रश्न बहुत आवश्यक है।क्योंकि कई बार हम संबंध नहीं निभा रहे होते, हम केवल अपने भीतर के डर को ढो रहे होते हैं।

डर- लोग क्या कहेंगे।

डर- वह क्या सोचेगा।

डर- इतना पुराना संबंध कैसे टूटेगा।

डर- शायद गलती मेरी ही हो।

लेकिन *किसी संबंध का इतिहास उसके वर्तमान से बड़ा नहीं हो सकता*। यदि वर्तमान लगातार आपको आहत कर रहा है, तो अतीत की सुंदरता को सम्मान देकर वर्तमान से दूरी बनाई जा सकती है। यह कटुता नहीं है। यह आत्मसंरक्षण है।किसी व्यक्ति से दूरी बनाना हमेशा घृणा नहीं होता।कई बार यह स्वयं को बचाने का सबसे शांत तरीका होता है। आप किसी को क्षमा कर सकते हैं और फिर भी उसके पास वापस न जाएँ।आप किसी के लिए बुरा न चाहें और फिर भी उससे संबंध न रखें। आप उसके प्रति द्वेष न रखें और फिर भी अपने जीवन के द्वार उसके लिए बंद कर दें।

यह विरोधाभास नहीं है।यह परिपक्वता है। क्षमा का अर्थ पुनः प्रवेश की अनुमति नहीं होता। और प्रेम का अर्थ आत्मविनाश नहीं होता। जीवन में कुछ लोग ऐसे होते हैं जो आपके प्रति लंबे समय तक नकारात्मक भाव रखते हैं। वे प्रत्यक्ष रूप से कुछ न कहें, फिर भी उनके व्यवहार में वह नकारात्मकता दिखाई देती है। उनकी दृष्टि में आप हर बार दोषी होते हैं। आपकी सफलता उन्हें असहज करती है। आपका अच्छा काम भी उन्हें दिखावा लगता है। आपकी चुप्पी उन्हें घमंड लगती है। आपकी स्पष्टता उन्हें आक्रमण लगती है। ऐसे व्यक्ति के सामने आप जितना स्वयं को समझाने की कोशिश करेंगे, उतना ही थकेंगे। क्योंकि कई बार समस्या आपके व्यवहार में नहीं होती। समस्या यह होती है कि सामने वाले ने अपने मन में आपकी एक स्थायी नकारात्मक छवि बना ली है। अब वह आपको देखता नहीं। वह अपनी बनाई हुई छवि को देखता है। ऐसी स्थिति में सबसे बड़ी भूल यह होती है कि हम लगातार स्वयं को निर्दोष सिद्ध करने में लग जाएँ। हर व्यक्ति को समझाना आवश्यक नहीं।

हर गलतफहमी दूर करना भी आवश्यक नहीं। कुछ लोगों को समय के हवाले कर देना चाहिए। क्योंकि जिसे आपको गलत ही समझना है, वह आपके सौ सही कामों में भी एक गलत अर्थ खोज लेगा। और जिसे आपका मन समझना है, उसे आपके मौन में भी आपका सत्य दिखाई देगा।इसलिए मानसिक स्पष्टता बहुत आवश्यक है। जब आपको यह समझ में आ जाए कि सामने वाला व्यक्ति आपके बारे में क्या सोचता है, तो आपके भीतर एक प्रकार की तैयारी आ जाती है। अब उसकी किसी बात से आप अचानक नहीं टूटते। आप जानते हैं कि उसकी प्रतिक्रिया कैसी हो सकती है। आप उसके व्यवहार को व्यक्तिगत आघात की तरह नहीं, उसके मन की स्थिति की तरह देखने लगते हैं।

यह समझ आपको मुक्त करती है। इसलिए कभी-कभी चीजों का स्पष्ट होना अच्छा है। हर चीज पर्दे में रहे, यह आवश्यक नहीं। हर रिश्ते में अनिश्चितता बनी रहे, यह भी आवश्यक नहीं। अस्पष्ट संबंध मन को सबसे अधिक थकाते हैं। जहाँ हमें पता ही न हो कि सामने वाला हमारा है भी या नहीं। सम्मान करता है भी या नहीं। पीठ पीछे क्या सोचता है।साथ क्यों है। वहाँ मन लगातार अनुमान में जीता है। और अनुमान से बड़ा तनाव कोई नहीं। कई बार कड़वा सत्य, मीठे भ्रम से बेहतर होता है।क्योंकि सत्य कम-से-कम हमें यह निर्णय लेने की स्वतंत्रता देता है कि अब आगे कैसे जीना है।

लेकिन यहाँ एक सावधानी भी आवश्यक है।केवल संदेह के आधार पर किसी संबंध को समाप्त कर देना उचित नहीं। किसी एक विवाद, किसी एक गलतफहमी या किसी एक कठोर वाक्य को पूरे रिश्ते का सत्य मान लेना भी उचित नहीं। मनुष्य से भूल होती है। हमसे भी। इसलिए जहाँ संवाद की संभावना हो, वहाँ संवाद होना चाहिए। जहाँ सुधार की संभावना हो, वहाँ अवसर देना चाहिए। जहाँ भ्रम हो, वहाँ स्पष्टता चाहिए। लेकिन जहाँ बार-बार वही अपमान दोहराया जाए, वही छल लौटे, वही दुर्भावना दिखाई दे और हर सुधार के अवसर को कमजोरी समझ लिया जाए- वहाँ दूरी ही कभी-कभी सबसे स्वस्थ निर्णय होती है।

जीवन बहुत छोटा है।इसे उन लोगों को मनाते- मनाते समाप्त नहीं किया जा सकता जिन्होंने तय कर लिया है कि वे आपको समझेंगे ही नहीं। हमारे पास सीमित मानसिक ऊर्जा है।उसे ऐसे संबंधों पर खर्च क्यों करें जो हमें भीतर से खाली कर रहे हैं? यह ऊर्जा उन लोगों के लिए बचाइए जिनके भीतर आपके लिए सम्मान है। जो आपकी सफलता पर प्रसन्न होते हैं।

जो आपकी अनुपस्थिति में भी आपका पक्ष रखते हैं।जो आपकी कमियों पर अकेले में बात करते हैं, दुनिया के सामने तमाशा नहीं बनाते। जो आपके जीवन में शांति बढ़ाते हैं, तनाव नहीं। रिश्ते संख्या से नहीं, गुणवत्ता से बड़े होते हैं। सौ औपचारिक संबंधों से बेहतर हैं पाँच सच्चे लोग। जीवन में हर किसी को साथ लेकर चलना संभव भी नहीं और आवश्यक भी नहीं।

आपकी जीवन-यात्रा एक रेलगाड़ी की तरह है।कुछ लोग पहले स्टेशन पर उतर जाएँगे। कुछ बीच रास्ते। कुछ अंत तक चलेंगे।

आप हर उतरने वाले यात्री को पकड़कर वापस नहीं बैठा सकते। और यदि ऐसा करेंगे तो आपकी अपनी यात्रा रुक जाएगी। इसलिए जाने वालों को जाने दीजिए। लेकिन घृणा के साथ नहीं। कृतज्ञता के साथ। जो समय अच्छा था, उसे अच्छा मानिए। जो सीख मिली, उसे स्वीकार कीजिए। और जहाँ संबंध बोझ बन गया, वहाँ उसे सम्मानजनक विराम दीजिए। हर समाप्ति युद्ध नहीं होती। कुछ समाप्तियाँ शांति होती हैं। कुछ दूरी उपचार होती है। कुछ मौन उत्तर होते हैं। और कुछ दरवाजे बंद करना इसलिए आवश्यक होता है ताकि जीवन में नई हवा प्रवेश कर सके।

कठोरता और सीमा में अंतर है। कठोर व्यक्ति दूसरों को चोट पहुँचाता है। सीमाबद्ध व्यक्ति स्वयं को अनावश्यक चोट से बचाता है। यह आत्मसम्मान है। जिस संबंध में आपको बार-बार स्वयं को छोटा करना पड़े, वहाँ प्रेम नहीं बचता। जिस संबंध में बार-बार अपनी गरिमा गिरानी पड़े, वहाँ निकटता का कोई अर्थ नहीं। और जिस संबंध में दूसरे की उपस्थिति से अधिक उसकी संभावित नकारात्मकता से डरने लगें, वहाँ मन को कुछ दूरी चाहिए। यह दूरी बाहर से नहीं, पहले भीतर से बनती है। आप निर्णय लेते हैं कि अब उसकी हर बात आपके भीतर प्रवेश नहीं करेगी। उसकी हर टिप्पणी आपको विचलित नहीं करेगी। उसकी हर प्रतिक्रिया आपके दिन का मौसम तय नहीं करेगी।यहीं से वास्तविक स्वतंत्रता शुरू होती है। *कई बार हम किसी व्यक्ति से दूर नहीं होते, हम उसके हमारे मन पर पड़े प्रभाव से दूर होते हैं। यही सबसे बड़ी मुक्ति है।

अंततः रिश्तों का अर्थ यह नहीं कि हम हर मूल्य पर उन्हें बचाएँ। रिश्तों का अर्थ है- दो मन एक-दूसरे की गरिमा बचाएँ। जहाँ गरिमा नहीं, वहाँ केवल आदत बचती है। जहाँ विश्वास नहीं, वहाँ केवल औपचारिकता। जहाँ सम्मान नहीं, वहाँ केवल इतिहास। और केवल इतिहास के आधार पर वर्तमान नहीं जिया जा सकता। इसलिए जीवन में कभी ऐसा मोड़ आए जब कोई संबंध आपके लिए निरंतर पीड़ा, भय, अविश्वास और मानसिक बोझ बन जाए, तो स्वयं से ईमानदार रहिए। पहले संवाद कीजिए। फिर समझने की कोशिश कीजिए। फिर सुधार का अवसर दीजिए। लेकिन अंततः यदि सब कुछ समाप्त हो चुका हो, तो केवल नाम के लिए संबंध मत ढोइए। *कुछ रिश्तों को छोड़ना हार नहीं है।वह अपने भीतर लौटना है।* कुछ लोगों से दूर होना पलायन नहीं है। वह शांति की ओर कदम है। और कुछ संबंधों को सुंदर मोड़ देकर वहीं छोड़ देना असफलता नहीं है। वह यह स्वीकार करना है कि हर कहानी का सुखद अंत साथ रहने में ही नहीं होता। कुछ कहानियाँ इसलिए सुंदर रहती हैं क्योंकि उन्हें सही समय पर समाप्त कर दिया गया।

जीवन की परिपक्वता शायद यही है- कि हम प्रेम करें, पर स्वयं को न खोएँ। क्षमा करें, पर अपनी सीमाएँ न मिटाएँ। संबंध निभाएँ, पर आत्मसम्मान की कीमत पर नहीं। और जब स्पष्ट हो जाए कि सामने वाला हमारे जीवन में प्रकाश नहीं, निरंतर अँधेरा ही बढ़ा रहा है, तो बिना घृणा, बिना प्रतिशोध और बिना अनावश्यक शोर के एक कदम पीछे हट जाएँ।

क्योंकि कभी-कभी सबसे करुण निर्णय यही होता है- किसी को उसके रास्ते पर छोड़ देना और स्वयं अपने रास्ते पर आगे बढ़ जाना। रिश्ता समाप्त हो सकता है।सम्मान नहीं। दूरी आ सकती है। द्वेष नहीं। यादें रह सकती हैं। बंधन नहीं। और शायद जीवन का सबसे स्वस्थ वाक्य यही है- जो संबंध आत्मा को लगातार घायल करे, उसे ढोना प्रेम नहीं; और जो दूरी मन को बचा ले, वह हमेशा बेरुखी नहीं होती। कभी-कभी संबंधों को बचाने से पहले स्वयं को बचाना पड़ता है।और कभी-कभी अजनबी हो जाना, शत्रु बने रहने से कहीं बेहतर होता है।

(डॉ विनय कुमार वर्मा:लेखक, कवि, मोटिवेशनल स्पीकर,सीएमडी सीपीएस स्कूल ऑफ ग्रुप)

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