शिक्षा

मित्र जीवन की सबसे सुंदर उपलब्धि: डॉ विनय कुमार वर्मा

चंदौली,यूपी: ईश्वर जब मनुष्य को इस पृथ्वी पर भेजता है, तब वह उसे एक परिवार देता है। माता-पिता, भाई-बहन, रक्त और वंश- ये सब हमें बिना पूछे मिल जाते हैं। किंतु जीवन की लंबी यात्रा में कुछ ऐसे लोग भी मिलते हैं, जिन्हें न प्रकृति चुनती है, न समाज; उन्हें हम स्वयं चुनते हैं। वही मित्र होते हैं। शायद इसी कारण मित्रता संसार का सबसे स्वतंत्र रिश्ता है। यह रक्त से नहीं, विश्वास से जन्म लेता है; जाति से नहीं, संवेदना से बनता है; धर्म से नहीं, हृदय से जुड़ता है।

मित्रता की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वह किसी परिचय की मोहताज नहीं होती। दो मन यदि एक-दूसरे की धड़कन सुन सकें, तो उनके बीच भाषा की आवश्यकता नहीं रहती। दो आत्माएँ यदि एक-दूसरे के दुःख का भार बाँट सकें, तो वहाँ रिश्तों की परिभाषाएँ छोटी पड़ जाती हैं।

मनुष्य का जीवन जितना उपलब्धियों से नहीं बनता, उससे कहीं अधिक उन लोगों से बनता है जो उन उपलब्धियों तक पहुँचने की यात्रा में उसके साथ चलते हैं। कोई परीक्षा में हमारे साथ बैठा था, कोई पहली नौकरी के संघर्ष में, कोई पहली असफलता के समय हमारे कंधे पर हाथ रखे खड़ा था, कोई तब भी मुस्कुरा रहा था जब पूरी दुनिया हमें असफल घोषित कर चुकी थी। बाद में इतिहास केवल हमारी सफलता लिखता है, लेकिन सफलता तक पहुँचने वाले रास्ते पर मित्रों के पदचिह्न दर्ज नहीं करता।

शायद इसलिए सच्चा मित्र इतिहास में कम और स्मृतियों में अधिक जीवित रहता है।

जीवन की सबसे सुंदर बात यह नहीं कि हमारे पास कितने लोग हैं; बल्कि यह है कि कितने लोग ऐसे हैं जिनके सामने हमें स्वयं को सिद्ध नहीं करना पड़ता। जिनके सामने हम अपने पद, प्रतिष्ठा, संपत्ति, विद्वता और उपलब्धियाँ दरवाज़े पर उतारकर बैठ सकते हैं। जो हमें इसलिए नहीं चाहते कि हम क्या हैं, बल्कि इसलिए चाहते हैं कि हम हम हैं।

ऐसा मित्र जीवन में एक भी मिल जाए, तो समझिए ईश्वर ने आपके हिस्से का एक अतिरिक्त आशीर्वाद लिख दिया है।

आज का मनुष्य परिचितों से घिरा हुआ है, पर मित्रों से नहीं। मोबाइल की संपर्क सूची में हजारों नंबर हैं, सोशल मीडिया पर हजारों ‘फ्रेंड्स’ हैं, लेकिन जब रात के दो बजे मन टूटता है, तब फोन करने योग्य एक व्यक्ति भी याद नहीं आता। यही आधुनिक समय की सबसे बड़ी विडंबना है।

संपर्क बढ़े हैं।

संवाद घटे हैं।

नेटवर्क विस्तृत हुआ है।

निकटता सिकुड़ गई है।

हम एक-दूसरे की तस्वीरें देखते हैं, लेकिन चेहरों के पीछे छिपी थकान नहीं देख पाते। हम जन्मदिन पर सैकड़ों शुभकामनाएँ लिख देते हैं, लेकिन किसी की उदासी का एक दिन अपने नाम नहीं करते। डिजिटल दुनिया ने हमें जोड़ने का दावा किया, पर उसने हमें भीतर से कितना अकेला कर दिया, इसका हिसाब कोई आँकड़ा नहीं बता सकता।

मित्रता कभी ऑनलाइन नहीं होती। वह मन के भीतर रहती है। कृष्ण और सुदामा की मित्रता इसलिए अमर नहीं हुई कि एक राजा था और दूसरा निर्धन। वह इसलिए अमर हुई क्योंकि वहाँ परिस्थितियाँ अलग थीं, लेकिन आत्मीयता समान थी। कृष्ण ने सुदामा के फटे वस्त्र नहीं देखे; उन्होंने अपने बालसखा का हृदय देखा। और सुदामा ने द्वारका का वैभव नहीं देखा; उन्होंने उसी कृष्ण को देखा जो कभी यमुना के तट पर उनके साथ हँसता था।

सच्चा मित्र आपकी स्थिति नहीं देखता, आपकी स्थिति के भीतर छिपे हुए आपको देखता है।मित्रता की सबसे बड़ी परीक्षा सुख में नहीं होती।सुख में तो भीड़ भी साथ चलती है। परीक्षा तब होती है जब जीवन की धूप तेज़ हो जाती है। जब सब लोग धीरे-धीरे दूर हटने लगते हैं।जब आपकी सफलता समाप्त हो जाती है। जब आपका पद चला जाता है।जब आपकी जेब खाली हो जाती है। जब आपके पास देने को कुछ नहीं बचता।उस समय जो व्यक्ति आपके पास बैठकर कहे- “चलो, चाय पीते हैं। सब ठीक हो जाएगा।” वही मित्र है।उसका यह वाक्य किसी दार्शनिक पुस्तक से बड़ा होता है।

क्योंकि मित्र समाधान नहीं देता, पहले सहारा देता है। जीवन में कई बार ऐसा भी होता है कि मित्र वर्षों तक नहीं मिलते। शहर बदल जाते हैं, व्यवसाय बदल जाते हैं, जिम्मेदारियाँ बदल जाती हैं। लेकिन जैसे ही वर्षों बाद मुलाकात होती है, समय बीच से हट जाता है। लगता है मानो पिछली बातचीत अभी कल ही समाप्त हुई थी। यही मित्रता का चमत्कार है।

कुछ रिश्ते समय के साथ पुराने हो जाते हैं। मित्रता समय के साथ गहरी हो जाती है। मित्रता का एक और अद्भुत पक्ष है- मित्र हमारे जीवन का सबसे ईमानदार दर्पण होता है। दुनिया हमारी सफलताओं पर ताली बजा सकती है, हमारे पद का सम्मान कर सकती है, हमारी प्रशंसा कर सकती है; लेकिन मित्र वह होता है जो हमारी आँखों में देखकर कह सके- “तू गलत है।” और आश्चर्य यह है कि उसके इस वाक्य में भी प्रेम होता है। संसार जहाँ हमारी कमियों को हथियार बनाता है, वहीं मित्र उन्हें सुधारने का अवसर बना देता है। इसलिए सच्चा मित्र केवल साथ देने वाला नहीं होता, वह हमें बेहतर मनुष्य बनाने वाला भी होता है।

जिस मित्र से केवल प्रशंसा मिले, उससे सावधान रहिए; और जो आपकी भूल पर भी आपका हाथ न छोड़े, उसे जीवनभर सँभालकर रखिए। क्योंकि प्रशंसा से अधिक मूल्यवान वह व्यक्ति होता है जो हमें गिरने से पहले पकड़ ले।

शायद यही कारण है कि भारतीय संस्कृति ने मित्रता को केवल सामाजिक संबंध नहीं माना। श्रीकृष्ण और अर्जुन का संबंध मित्रता का ऐसा रूप है, जहाँ स्नेह और सत्य साथ-साथ चलते हैं। कुरुक्षेत्र में कृष्ण ने अर्जुन को केवल सांत्वना नहीं दी, उन्होंने उसके भ्रम को तोड़ा। उन्होंने उसे वही नहीं कहा जो अर्जुन सुनना चाहता था, बल्कि वह कहा जो उसके लिए आवश्यक था। सच्चा मित्र वही है जो हमारी भावनाओं का सम्मान करे, पर हमारे भ्रमों का समर्थन न करे।  जीवन में कुछ मित्र ऐसे भी मिलते हैं जो बहुत कम बोलते हैं, पर उनकी उपस्थिति ही आश्वासन होती है। वे हर दिन संदेश नहीं भेजते, हर सप्ताह मुलाक़ात नहीं करते, लेकिन जब जीवन की नाव भँवर में फँसती है, सबसे पहले वही किनारे पर दिखाई देते हैं। वे मित्र शब्दों से नहीं, समय से प्रेम जताते हैं। ऐसे लोग ईश्वर की उस प्रार्थना का उत्तर होते हैं, जिसे हमने कभी शब्दों में माँगा भी नहीं था।

दूरी मित्रता की शत्रु नहीं होती। कई बार दूरी ही मित्रता को उसकी वास्तविक ऊँचाई देती है। जो संबंध केवल निकटता से जीवित हो, वह मित्रता नहीं, आदत है। मित्रता वहाँ जीवित रहती है जहाँ वर्षों का मौन भी विश्वास को कम नहीं करता। कई बार हम वर्षों तक बात नहीं करते, लेकिन मन में यह विश्वास अडिग रहता है कि यदि आज पुकारूँगा, तो वह अवश्य आएगा। यही विश्वास मित्रता की सबसे बड़ी पूँजी है।

मित्रता का सबसे सुंदर पक्ष यह भी है कि वह किसी परिचय की मोहताज नहीं होती। उसे धर्म नहीं चाहिए, जाति नहीं चाहिए, भाषा नहीं चाहिए, प्रदेश नहीं चाहिए। यदि हृदय मिल जाएँ, तो सारी सीमाएँ छोटी पड़ जाती हैं। इतिहास गवाह है कि मनुष्यता की सबसे सुंदर कहानियाँ वहीं जन्मी हैं, जहाँ मित्रता ने पहचान से ऊपर उठकर आत्मा को पहचाना है।

आज जब समाज छोटी-छोटी पहचानों में बँटता जा रहा है, तब मित्रता हमें यह सिखाती है कि मनुष्य पहले मनुष्य है, उसके बाद कुछ और। मित्रता किसी धर्म का विस्तार नहीं, मनुष्यता का उत्सव है। उसमें न ऊँच-नीच है, न अपना-पराया। वहाँ केवल एक प्रश्न होता है- “क्या तुम मेरे दुःख में मेरे साथ खड़े रहोगे?” यदि उत्तर “हाँ” है, तो बाकी सारी पहचानें स्वतः गौण हो जाती हैं।

मुझे लगता है कि ईश्वर ने मित्र इसलिए बनाए कि मनुष्य अकेला न रह जाए। परिवार हमें जन्म देता है, समाज हमें पहचान देता है, लेकिन मित्र हमें जीना सिखाते हैं। वे हमारे जीवन की उन पंक्तियों को पूरा करते हैं जिन्हें हम स्वयं नहीं लिख पाते।    कई बार जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि कोई पुरस्कार नहीं होती, कोई पद नहीं होता, कोई सम्मान नहीं होता; बल्कि वह एक पुराना मित्र होता है, जिसके सामने बैठकर हम वर्षों बाद भी उसी सहजता से हँस सकें जैसे बचपन में हँसा करते थे।

मित्रता का सबसे बड़ा सौंदर्य यह है कि उसमें कोई प्रतियोगिता नहीं होती। जहाँ तुलना शुरू हो जाए, वहाँ मित्रता धीरे-धीरे समाप्त होने लगती है। यदि मेरे मित्र की सफलता मुझे छोटी करने लगे, यदि उसकी उपलब्धि मेरे भीतर ईर्ष्या जगा दे, यदि उसकी प्रगति मुझे बेचैन कर दे, तो समझ लेना चाहिए कि वहाँ मित्रता नहीं, केवल परिचय बचा है। सच्चा मित्र वह है, जो आपकी जीत को अपनी जीत की तरह मनाए और आपकी हार को अपने हिस्से का दुःख समझे।

जीवन के लंबे अनुभव ने एक बात और सिखाई है- मित्रों की संख्या कभी महत्वपूर्ण नहीं होती, उनकी सच्चाई महत्वपूर्ण होती है। सौ लोगों का साथ मिल जाना उपलब्धि नहीं है; एक ऐसा व्यक्ति मिल जाना उपलब्धि है, जिसके सामने हम बिना किसी भय, बिना किसी अभिनय और बिना किसी मुखौटे के स्वयं बने रह सकें। दुनिया के सामने हम अपने शब्दों को सँभालते हैं, अपने व्यवहार को सँभालते हैं, अपनी छवि को सँभालते हैं; पर मित्र के सामने हम स्वयं को सँभालते नहीं, स्वयं को जीते हैं। यही मित्रता की सबसे बड़ी स्वतंत्रता है।हर मनुष्य को जीवन में कम-से-कम एक ऐसा मित्र अवश्य मिलना चाहिए, जिसके सामने वह रो सके, हँस सके, हार सके, स्वीकार कर सके कि वह भी कमजोर है। क्योंकि जो व्यक्ति केवल अपनी सफलताओं को साझा करता है, वह परिचितों के बीच रहता है; और जो अपनी असफलताओं को भी निस्संकोच साझा कर सके, वह मित्र के साथ रहता है।

आज का समय मनुष्य को पहले से अधिक सफल बना रहा है, लेकिन शायद पहले से अधिक अकेला भी। ऊँची इमारतों में रहने वाले लोग कभी-कभी भीतर से इतने खाली होते हैं कि उनके पास अपनी ख़ामोशी सुनने वाला भी कोई नहीं होता। इसलिए आज सबसे बड़ा संकट धन का नहीं, विश्वास का है; सबसे बड़ी कमी समय की नहीं, आत्मीयता की है। ऐसे समय में यदि किसी के जीवन में एक सच्चा मित्र है, तो वह सचमुच सौभाग्यशाली है।मित्रता को बचाने के लिए केवल प्रेम पर्याप्त नहीं होता; उसमें विनम्रता भी चाहिए, क्षमा भी चाहिए और समय भी। हर संबंध की तरह मित्रता भी उपेक्षा से सूख जाती है। इसलिए कभी-कभी बिना किसी कारण मित्र को याद कर लेना, उसके हालचाल पूछ लेना, उसकी सफलता पर सबसे पहले प्रसन्न होना और उसके दुःख में बिना बुलाए पहुँच जाना- यही मित्रता का धर्म है।

इसलिए मुझे लगता है कि ईश्वर जब मनुष्य के भाग्य में कुछ सबसे सुंदर लिखता है, तो वह केवल सुख नहीं लिखता, वह एक सच्चा मित्र भी लिखता है। क्योंकि सुख क्षणिक हो सकता है, संपत्ति छिन सकती है, पद बदल सकते हैं, पहचान मिट सकती है; लेकिन एक सच्चे मित्र की स्मृति जीवन के अंतिम पड़ाव तक मनुष्य के भीतर जलती रहती है। वह कभी-कभी व्यक्ति नहीं रह जाता, हमारी प्रार्थनाओं का हिस्सा बन जाता है।इसलिए यदि आपके जीवन में कोई ऐसा मित्र है जो आपके मौन को पढ़ लेता है, आपकी अनुपस्थिति में भी आपका सम्मान करता है, आपकी सफलता पर गर्व करता है और आपकी विफलता में आपका हाथ नहीं छोड़ता- तो उसे केवल मित्र मत कहिए, उसे अपने जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि मानिए।और यदि ऐसा कोई मित्र अभी तक नहीं मिला, तो निराश मत होइए। पहले स्वयं किसी के जीवन में वैसा मित्र बन जाइए। क्योंकि संसार का सबसे सुंदर नियम यही है- जो प्रेम हम निस्वार्थ होकर बाँटते हैं, वही किसी न किसी रूप में लौटकर हमारे जीवन को समृद्ध कर देता है।

शायद इसी कारण मुझे लगता है-मित्र ईश्वर का दिया हुआ वह रिश्ता है, जिसे जन्म नहीं देता, विश्वास जन्म देता है।और सच तो यह है कि घर हमें रहने की जगह देता है, पर एक सच्चा मित्र हमें जीने की वजह दे देता है।

(डॉ. विनय कुमार वर्मा: लेखक, समाजसेवी, कवि,मोटिवेशनल स्पीकर, सीएमडी: सीपीएस स्कूल ऑफ ग्रुप)

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