राखी :भाई-बहन के स्नेह से मनुष्यता के विश्वास तक:डॉ. विनय कुमार वर्मा

चंदौली,यूपी: मनुष्य जब इस पृथ्वी पर आया, तब उसके पास न कोई राज्य था, न कोई संविधान, न कोई सेना और न कोई सुरक्षा कवच। यदि कुछ था तो केवल एक-दूसरे पर विश्वास करने की सहज मानवीय प्रवृत्ति। शायद उसी दिन किसी ने किसी का हाथ थामा होगा, किसी ने किसी के भय को अपने साहस से ढँक लिया होगा और किसी ने किसी से कहा होगा- “डरो मत, मैं तुम्हारे साथ हूँ।” संभवतः उसी क्षण रक्षाबंधन का पहला बीज धरती पर अंकुरित हुआ होगा। श्रावण पूर्णिमा बाद में आई, रेशम और सूत के धागे बाद में बने; सबसे पहले जन्मा था- विश्वास।
भारतीय संस्कृति ने इस विश्वास को एक पर्व का रूप दिया और उसका नाम रखा- रक्षाबंधन।
यह केवल भाई की कलाई पर बहन द्वारा बाँधा जाने वाला धागा नहीं है। यह उस अदृश्य वचन का उत्सव है, जिसमें प्रेम उत्तरदायित्व बन जाता है, स्नेह संकल्प बन जाता है और संबंध सुरक्षा का पर्याय बन जाते हैं। यही कारण है कि राखी का धागा जितना कलाई पर दिखाई देता है, उससे कहीं अधिक हृदय में बँधा रहता है।
श्रावण पूर्णिमा की सुबह भारतीय जीवन में एक अलग ही आभा लेकर आती है। रात भर वर्षा से धुली धरती, बादलों के बीच से झाँकता सूर्य, तुलसी के चौरे पर जलती दीपशिखा, घरों में बनते पकवानों की सुगंध, रंग-बिरंगी राखियों से सजी थालियाँ और बहनों की आँखों में झिलमिलाती प्रतीक्षा- सब मिलकर ऐसा वातावरण रचते हैं, मानो पूरा घर प्रेम का मंदिर बन गया हो।
एक ओर बहनें रोली, अक्षत, दीप और मिठाई से थाल सजाती हैं, दूसरी ओर भाई भी अनायास ही बचपन की उन स्मृतियों में लौटने लगते हैं, जब छोटी-सी कलाई पर पहली बार राखी बँधी थी। उस समय न उपहार का मूल्य था, न धन का आकर्षण। पाँच पैसे की मिठाई और एक खिलौना भी संसार की सबसे बड़ी सौगात लगता था। क्योंकि उस समय लेन-देन नहीं, मन का आदान-प्रदान होता था।
राखी का सबसे सुंदर पक्ष यही है कि यह हमें उम्र से नहीं, स्मृतियों से जोड़ती है।
एक सफल उद्योगपति भी राखी बँधवाते समय उसी मासूम बालक में बदल जाता है, जो कभी बहन की चोटी खींचकर भाग जाता था। एक वृद्ध बहन भी अपने अस्सी वर्ष के भाई के माथे पर तिलक लगाते समय वही स्नेह महसूस करती है, जो बचपन में करती थी। समय शरीर को बूढ़ा करता है, रिश्तों को नहीं।यही इस पर्व का चमत्कार है।
भारतीय परंपरा में रक्षाबंधन की जड़ें अत्यंत गहरी हैं। हमारे पुराण और इतिहास इस बात के साक्षी हैं कि रक्षा का सूत्र केवल पारिवारिक संबंधों तक सीमित नहीं रहा।जब देवासुर संग्राम में इंद्र बार-बार पराजित होने लगे, तब इंद्राणी ने श्रावण पूर्णिमा के दिन उनके हाथ में रक्षा-सूत्र बाँधा। वह धागा कोई जादू नहीं था; वह आत्मविश्वास का संचार था। उसने यह संदेश दिया कि जब किसी के पीछे विश्वास खड़ा होता है, तब उसकी शक्ति कई गुना बढ़ जाती है।महाभारत में द्रौपदी द्वारा कृष्ण की घायल उँगली पर अपने आँचल का टुकड़ा बाँधने का प्रसंग भी यही बताता है कि रक्षा का संबंध केवल रक्त से नहीं होता। वह करुणा से जन्म लेता है। कृष्ण ने उस क्षण कोई वचन नहीं दिया, पर समय आने पर चीरहरण के समय उसी करुणा का ऋण चुकाया। भारतीय संस्कृति ने इस कथा के माध्यम से यह समझाया कि राखी धागे से नहीं, भावना से बनती है।
इसी प्रकार लक्ष्मी और राजा बलि की कथा में भी यह पर्व केवल भाई-बहन का नहीं, विश्वास का पर्व बन जाता है। लक्ष्मी ने बलि को भाई कहा, बलि ने उन्हें बहन स्वीकार किया और एक नया संबंध जन्म ले लिया। यहाँ रक्त का कोई संबंध नहीं था, फिर भी आत्मीयता ने उसे अमर बना दिया।
यही भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता है।वह रिश्तों को जन्म से नहीं, जिम्मेदारी से पहचानती है।शायद इसी कारण हमारे यहाँ गुरु भी पिता कहलाते हैं, पृथ्वी भी माता कहलाती है, गंगा भी माँ बन जाती है और वृक्ष भी पूजनीय हो उठते हैं।
रक्षाबंधन इसी व्यापक भारतीय दृष्टि का उत्सव है।यह हमें सिखाता है कि मनुष्य केवल अपने परिवार की रक्षा करने के लिए नहीं जन्मा; उसे उन सभी मूल्यों की रक्षा करनी है, जिनसे समाज जीवित रहता है- विश्वास, सम्मान, संवेदना और प्रेम। आज जब दुनिया में अविश्वास बढ़ रहा है, रिश्ते सुविधाओं के आधार पर बन और टूट रहे हैं, तब रक्षाबंधन पहले से अधिक प्रासंगिक हो उठता है। यह हमें याद दिलाता है कि किसी भी सभ्यता की सबसे बड़ी शक्ति उसके हथियार नहीं, उसके विश्वास के रिश्ते होते हैं।
और शायद इसीलिए…राखी केवल भाई की कलाई पर नहीं बँधती, वह मनुष्य के अंतःकरण पर बँधती है।यदि रक्षाबंधन केवल भाई-बहन का पर्व होता, तो शायद वह हजारों वर्षों तक भारतीय संस्कृति के केंद्र में न टिक पाता। उसकी दीर्घायु का रहस्य इस बात में छिपा है कि उसने हर युग में अपने अर्थ का विस्तार किया है। वह परिवार से समाज तक, समाज से राष्ट्र तक और राष्ट्र से संपूर्ण मनुष्यता तक अपनी डोर फैलाता चला गया।इतिहास के पन्नों में अनेक ऐसे प्रसंग मिलते हैं, जहाँ राखी ने रक्त के रिश्तों से आगे बढ़कर मानवता का नया अध्याय लिखा। चित्तौड़ की महारानी कर्मावती द्वारा मुगल सम्राट हुमायूँ को भेजी गई राखी केवल एक रेशमी धागा नहीं थी; वह संकट में खड़ी एक स्त्री का विश्वास था। इतिहास चाहे उस घटना के परिणामों पर अलग-अलग मत रखता हो, पर भारतीय जनमानस ने उसमें यह संदेश देखा कि विश्वास कभी धर्म, जाति और सत्ता की सीमाओं में कैद नहीं होता।
बीसवीं शताब्दी में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने बंग-भंग आंदोलन के समय राखी को सामाजिक एकता का प्रतीक बनाया। उन्होंने हिन्दू और मुसलमानों की कलाइयों पर राखी बँधवाकर यह संदेश दिया कि यदि मनुष्य एक-दूसरे की रक्षा का संकल्प ले लें, तो विभाजन की राजनीति स्वयं पराजित हो जाएगी। उस दिन राखी ने भाई-बहन के रिश्ते से आगे बढ़कर पूरे समाज को एक सूत्र में बाँधने का प्रयास किया।यही भारतीय संस्कृति की विशेषता है। यहाँ एक पर्व कभी एक अर्थ में स्थिर नहीं रहता। वह समय के साथ अपने अर्थों का विस्तार करता चलता है।आज भी यह दृश्य कितना मार्मिक होता है, जब देश की सीमाओं पर तैनात सैनिकों की कलाइयों पर अनजान बहनों की राखियाँ बँधती हैं। वे बहनें सैनिकों को व्यक्तिगत रूप से नहीं जानतीं, सैनिक भी उनके परिवार का हिस्सा नहीं होते; फिर भी दोनों के बीच एक ऐसा संबंध बन जाता है, जिसे केवल भारतीय संस्कृति ही समझ सकती है। राखी बँधते ही सैनिक की कलाई पर केवल धागा नहीं आता, उसके साथ करोड़ों परिवारों का विश्वास भी बँध जाता है। और बहन के मन में यह संतोष उतर आता है कि सीमा पर खड़ा वह जवान केवल देश का सैनिक नहीं, उसका अपना भाई भी है।
रक्षाबंधन का सबसे बड़ा चमत्कार यही है कि वह परिचय से पहले अपनापन पैदा करता है।आज यह पर्व नए-नए रूपों में हमारे सामने उपस्थित हो रहा है। कहीं बच्चियाँ पुलिसकर्मियों को राखी बाँध रही हैं, कहीं डॉक्टरों को, कहीं सफाईकर्मियों को, कहीं अग्निशमन दल के जवानों को। कई स्थानों पर वृक्षों को राखी बाँधी जाती है, नदियों को राखी अर्पित की जाती है और यह संकल्प लिया जाता है कि उनकी रक्षा भी उतनी ही आवश्यक है, जितनी अपने परिवार की।यह परिवर्तन परंपरा से विचलन नहीं है; बल्कि परंपरा का स्वाभाविक विस्तार है।आख़िर रक्षा का अर्थ केवल किसी व्यक्ति की सुरक्षा ही तो नहीं है।
रक्षा का अर्थ है-विश्वास की रक्षा।सम्मान की रक्षा।प्रकृति की रक्षा।संस्कृति की रक्षा।और सबसे बढ़कर—मनुष्यता की रक्षा।
समय बदला है। संयुक्त परिवार छोटे हुए हैं। बहनें देश-विदेश में बस गई हैं। भाई अलग-अलग शहरों में नौकरी कर रहे हैं। पहले राखी के लिए लोग दिन गिनते थे, आज कुरियर की ट्रैकिंग देखते हैं। पहले डाकिया राखी लेकर आता था, अब मोबाइल स्क्रीन पर वीडियो कॉल खुलती है। पहले बहन अपने हाथों से मिठाई खिलाती थी, आज स्क्रीन के उस पार मुस्कुराकर कहती है-
“भैया, मिठाई मेरी तरफ़ से समझ लेना।”दृश्य बदल गए हैं…लेकिन क्या भाव बदल गए हैं?शायद नहीं।
धागा यदि डाक से पहुँचे, विमान से पहुँचे या डिजिटल संदेश के रूप में पहुँचे- उसका मूल्य उसके माध्यम में नहीं, उसके मन में होता है।हाँ, एक परिवर्तन अवश्य हुआ है। पहले राखी का सबसे बड़ा उपहार मिठाई और कुछ रुपये हुआ करते थे। आज अनेक बहनें अपने भाइयों से अलग तरह के उपहार माँग रही हैं-“धूम्रपान छोड़ दो…”, “माँ-बाप का ध्यान रखना…”, “किसी बेटी की पढ़ाई का खर्च उठाना…”, “हर वर्ष एक पेड़ लगाना…”।
यह देखकर लगता है कि राखी अब केवल उपहार का पर्व नहीं रही; वह उत्तरदायित्व का उत्सव बन रही है।शायद यही उसकी सबसे सुंदर यात्रा है।क्योंकि जो पर्व समय के साथ अपने अर्थ का विस्तार नहीं करते, वे धीरे-धीरे स्मृतियों में सिमट जाते हैं।रक्षाबंधन आज भी जीवित है क्योंकि उसने हर युग से संवाद किया है। उसने केवल परंपरा को नहीं बचाया, उसने समय को भी स्वीकार किया।और इसी कारण…राखी का धागा आज भी उतना ही मजबूत है, जितना तब था, जब पहली बार किसी बहन ने किसी भाई की कलाई पर विश्वास बाँधा होगा। किसी भी पर्व की वास्तविक शक्ति उसके अनुष्ठानों में नहीं, उसके दर्शन में होती है। दीपावली केवल दीप जलाने का नाम नहीं, अंधकार पर प्रकाश की विजय है। होली केवल रंगों का खेल नहीं, मन के मैल को धोने का अवसर है। उसी प्रकार रक्षाबंधन भी केवल कलाई पर धागा बाँधने की परंपरा नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर बसे उस विश्वास को जीवित रखने का महापर्व है, जो कहता है- “मैं तुम्हारी रक्षा करूँगा, और तुम्हारी गरिमा कभी आहत नहीं होने दूँगा।”
….लेकिन आज यदि हम अपने समय की ओर देखें, तो एक प्रश्न अनायास मन में उठता है- क्या सचमुच हमारी कलाई पर बँधा धागा हमारे व्यवहार तक पहुँच पाया है?हर वर्ष लाखों राखियाँ बँधती हैं, पर क्या हर बहन स्वयं को सुरक्षित महसूस करती है? क्या हर भाई केवल उपहार देने तक अपने दायित्व की पूर्ति मान लेता है, या वह जीवनभर अपनी बहन के सम्मान, उसके आत्मविश्वास और उसके अधिकारों की रक्षा का भी संकल्प निभाता है?रक्षाबंधन हमें यही आत्ममंथन करने के लिए बुलाता है।रक्षा का अर्थ केवल संकट आने पर तलवार उठाना नहीं है। रक्षा का अर्थ है- किसी की आँखों के आँसू आने से पहले उसके साथ खड़ा हो जाना। किसी के अकेलेपन को बाँट लेना। किसी के सम्मान को अपनी प्रतिष्ठा समझना। किसी के भय को अपना भय मान लेना। जब भाई अपनी बहन के सपनों की रक्षा करता है, तब रक्षाबंधन सार्थक होता है।
जब बहन भाई के चरित्र, संस्कार और मानवता को जीवित रखने की प्रेरणा देती है, तब रक्षाबंधन पूर्ण होता है।यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में राखी का धागा कभी एकतरफ़ा नहीं रहा। बहन केवल सुरक्षा नहीं माँगती; वह भाई को धर्म, मर्यादा और कर्तव्य का स्मरण भी कराती है। उसकी राखी मानो मौन भाषा में कहती है- “तुम्हारी शक्ति तभी सार्थक है, जब वह किसी निर्बल के काम आए।” आज संसार पहले की तुलना में कहीं अधिक आधुनिक है, पर शायद पहले से अधिक अकेला भी है। ऊँची-ऊँची इमारतों में रहने वाले लोग अपने पड़ोसियों तक को नहीं जानते। परिवार छोटे हो गए हैं, संवाद संक्षिप्त हो गए हैं, समय तेज़ हो गया है और रिश्ते कभी-कभी सुविधाओं की शर्तों पर टिके दिखाई देते हैं।
ऐसे समय में रक्षाबंधन केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि सामाजिक आवश्यकता बन जाता है।आज मनुष्यता को सबसे अधिक आवश्यकता ऐसे ही धागों की है- जो मनुष्य को मनुष्य से जोड़ सकें।जो जाति से ऊपर उठें।जो धर्म से ऊपर उठें।जो भाषा और प्रदेश की सीमाओं से आगे निकल जाएँ।जो यह कह सकें कि इस पृथ्वी पर रहने वाला प्रत्येक मनुष्य दूसरे मनुष्य की गरिमा की रक्षा का उत्तरदायी है।
कल्पना कीजिए, यदि हर नागरिक अपने देश के प्रति वही भावना रखे, जो एक भाई अपनी बहन के प्रति रखता है; यदि हर शिक्षक अपने विद्यार्थियों को उसी आत्मीयता से देखे; यदि हर चिकित्सक अपने रोगी में अपने परिवार का सदस्य देखे; यदि हर सैनिक पूरे देश को अपना परिवार माने; यदि हर जनप्रतिनिधि जनता को अपना संबंधी समझे- तो शायद अनेक कानूनों की आवश्यकता ही न पड़े।
क्योंकि जहाँ संबंध जीवित रहते हैं, वहाँ भय कम हो जाता है।
रक्षाबंधन का यही सबसे बड़ा संदेश है।
यह हमें अधिकार नहीं, उत्तरदायित्व देता है।
यह हमें लेने से पहले देने की शिक्षा देता है।
यह हमें बताता है कि किसी संबंध की सबसे बड़ी पहचान उपहार नहीं, उपस्थिति होती है। संकट के समय जो साथ खड़ा हो जाए, वही वास्तव में अपना है।
आज जब कोई नन्ही बहन अपने भाई की कलाई पर राखी बाँधती है, तो वह केवल मिठाई और उपहार का आदान-प्रदान नहीं करती। वह आने वाले समय के लिए एक संस्कार बोती है। वह एक ऐसे नागरिक का निर्माण करती है, जो किसी भी स्त्री का सम्मान करना सीखे, किसी भी अन्याय के विरुद्ध खड़ा होना सीखे और अपने सामर्थ्य को केवल अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए भी उपयोग करना सीखे।यही कारण है कि रक्षाबंधन केवल परिवार का पर्व नहीं, सभ्यता का संस्कार है।श्रावण पूर्णिमा का चाँद हर वर्ष आकाश में फिर उगेगा।राखियाँ फिर बिकेंगी।थालियाँ फिर सजेंगी।रोली और अक्षत फिर कलाई को स्पर्श करेंगे।लेकिन इस पर्व की वास्तविक सफलता तब होगी, जब राखी केवल हाथों पर नहीं, हमारे विचारों पर भी बँधेगी; जब हम केवल अपनी बहनों की नहीं, इस समाज की प्रत्येक बेटी के सम्मान की रक्षा का संकल्प लेंगे; जब हम केवल अपने परिवार की नहीं, इस देश की आत्मा की रक्षा का व्रत लेंगे।तब रक्षाबंधन सचमुच भाई-बहन के स्नेह से मनुष्यता के विश्वास तक पहुँच जाएगा।और तब यह सूत का साधारण-सा धागा नहीं रहेगा- यह उस सभ्यता का हस्ताक्षर बन जाएगा, जिसने संसार को सिखाया कि सबसे मजबूत बंधन लोहे की जंजीर नहीं, विश्वास की डोर होती है।इसीलिए रक्षाबंधन हर वर्ष हमें केवल यह नहीं कहता कि “राखी बाँधो”- वह यह भी कहता है- “किसी के विश्वास के योग्य बनो।”यही रक्षाबंधन का शाश्वत संदेश है।
(डॉ. विनय कुमार वर्मा :लेखक, समाजसेवी,कवि, मोटिवेशनल स्पीकर,सीएमडी: सीपीएस स्कूल ऑफ ग्रुप)



